About Us



मेरे एहसास इस मंदिर मे अंकित हैं...जीवन के हर सत्य को मैंने इसमे स्थापित करने की कोशिश की है। जब भी आपके एहसास दम तोड़ने लगे तो मेरे इस मंदिर मे आपके एहसासों को जीवन मिले, यही मेरा अथक प्रयास है...मेरी कामयाबी आपकी आलोचना समालोचना मे ही निहित है...आपके हर सुझाव, मेरा मार्ग दर्शन करेंगे...इसलिए इस मंदिर मे आकर जो भी कहना आप उचित समझें, कहें...ताकि मेरे शब्दों को नए आयाम, नए अर्थ मिल सकें ...

20 मई, 2013

सही मायनों में जी भरके




कहते हैं सब रहिमन की पंक्तियाँ -
"रहिमन निज मन की व्यथा, मन ही राखो गोय। 
सुनि इठिलैहें लोग सब, बाटि न लैहैं कोय।।"

तो व्यथा की चीख मन में रख हो जाओ बीमार 
डॉक्टर के खर्चे उठाओ 
नींद की दवा लेकर सुस्त हो जाओ !!!!!!!!!!!!!!!

रहीम का मन इठलानेवाला नहीं था न 
व्यथित रहा होगा मन 
तो एहसासों को लिखा होगा ....
जो  सच में व्यथित  है - वह कैसे इठलायेगा 
तो ........
कहीं तो होगा ऐसा कोई रहीम 
जिससे मैं जी भर बातें कर सकूँ 
सूखी आँखें उसकी भी उफन पड़े 
मैं भी रो लूँ जी भर के .............. 
सही मायनों में जी भरके 

23 अप्रैल, 2013

या फिर लिखते रहो यूँ ही कुछ कुछ -



धूल से सने पाँव 
एक दूसरे के बाल खींचते हाथ 
तमतमाए चेहरे 
कान उमेठे जाने पर 
अपमानित चेहरा 
और प्रण लेता मन .... अगली बार देख लेंगे ....
भाई-बहन के बीच का यह रिश्ता 
कुछ खट्टा कुछ मीठा 
कितना जबरदस्त !....
शैतानियों के जंगल से 
अगले कारनामे की तैयारी कितने मन से होती थी !
......
फिर स्कूल,कॉलेज,किसी की नौकरी,किसी की शादी 
..... कुछ उदासी,कुछ अकेलापन 
तो रहने लगा छुट्टियों का इंतज़ार 
छोटी छोटी लड़ाइयाँ 
अकेले होने का डर 
फिर भी शिकायतों की पिटारी .... अगली छुट्टी के लिए !

फिर अपना घर,अपनी परेशानी 
आसान नहीं रह जाती ज़िन्दगी उतनी 
जितनी माँ के आँचल में होती है 
एक नहीं कई तरफ दृष्टि घुमानी होती है 
कभी घर,कभी ऑफिस,कभी थकान,कभी बच्चों का स्कूल ....
बचपन से बड़े होने के लम्बे धागे में 
जाने कितने लाल,हरे,नीले,पीले कारण गूंथते जाते हैं 
.........
समय हवाई जहाज बन उड़ता है 
बिना टिकट हमें उसके साथ उड़ना होता है 
न बारिश,न धुंध,.... कोई समस्या समय के आगे नहीं 
उसकी मर्ज़ी -
वह उड़ाता जाए 
और अचानक उतार दे 
उसके बाद ?
डरने से,सिहरने से भी क्या 
यादों के बीच मुस्कुराते हुए 
बहुत कुछ याद कर आंसू बहाते हुए 
हम कितने बेबस होते हैं ....
यह भी ज़रूरी है - वह भी ज़रूरी है के जाल में फंसकर 
हम दूर हो जाते हैं 
छुट्टियों के इंतज़ार के मायने भी खो जाते हैं 
रह जाता है एक शून्य 
जिसमें रिवाइंड,प्ले चलता है 
मन को उसमें लगाना पड़ता है ............

या फिर लिखते रहो यूँ ही कुछ कुछ - 


16 अप्रैल, 2013

यह भी एक रहस्यात्मक तथ्य है !



परिक्रमा तो मैंने बहुत सारी की
और जाना -
,..... हर रिश्तों की अपनी अपनी अग्नि होती है
अपने अपने मंत्र ....
पूरी परिक्रमा तो अभी शेष ही है
जो शेष रह ही जाती है
क्योंकि शेष में ही आगामी विस्तार है !

इस मध्यरूपेण यात्रा में इतना जाना
कि मंत्र मन के खामोश स्वर से निःसृत होते हैं
और वही निभते और निभाये जाते हैं !
हम सब जानते हैं
जीवन के प्रत्येक पृष्ठ पर
कथ्य और कृत्य में फर्क होता है
और इसे जानना समझना
सहज और सरल नहीं ...
सम्भव भी नहीं
..... !!!
इस परिक्रमा के पहले दौर में ही
शायद नहीं चाहते हुए भी
मैंने संस्कारों को अपना प्रतिनिधि बनाया ...
विरासत में कुछ सोच ही मिले थे घर से
जिनके विरोध में हम आपस में तर्क करते गए
पर - किया वही
जो जड़ से मिला ...
जड़ें गहरी थीं
कटकर भी ख्याल पनपते गए
पौधे से वृक्ष का
घने वृक्ष का सिलसिला चलता रहा ...
दुखद कहें
या हास्यास्पद
या अद्भुत
वृक्ष की छाँव में बहेलिया भी बैठा जाल लेकर
घोंसले में पक्षी भयभीत हुए
पर वृक्ष की परम्परागत शाखाओं ने
उन्हें भय का स्वर्णिम उद्देश्य सिखाया
कहा -
बहेलिया नहीं बदलेगा - तय है
तो हम क्यूँ बदल जाएँ
जीवन की बाजी यूँ ही चलती है
जीत हार में भी होती है
दिखाई बाद में देती है"
....
परिक्रमा के रास्ते सीधे नहीं थे
जितनी आसानी से कोई कहानी कही जाती है
उतने आसान न रास्ते होते हैं
न मन की स्थिति
विरोध के दावानल में घिरा मन
मस्तिष्क से जूझता रहता है
जूझते मन की  ऐसी दशा से
हर युग की मुलाकात हुई - स्तम्भ की तरह
हर पलड़े पर संस्कार भारी पड़ा
फिर भी ...
असत्य अंगारे बिछाता गया ...
पाँव के छाले अपने नहीं होते
तो सब प्रश्नपत्र लेकर बैठ जाते हैं
अपनों के निर्मित कटघरे में
मोह के कई बंधन टूट जाते हैं
टूटे धागे
कांच की तरह चुभते हैं
अदृश्य दर्द के निशान
कई कहानियों का समापन होते हैं !
....
अंत एक दर्शन है
जीवन की साँसों का
रिश्तों का
विश्वास का, प्यार का ...........
एक अद्भुत रहस्य अंत से आरम्भ होता है
अद्वैत के प्रस्फुटित मंत्रोचार में
जो सूर्योदय की प्रत्येक किरण की परिक्रमा में है
और ख़त्म नहीं होती
....
 परिक्रमा अभी बाकी है .... कुछ रहस्य,कुछ तथ्य - अभी बाकी हैं
कब तक ???????
यह भी एक रहस्यात्मक तथ्य है !

07 अप्रैल, 2013

सच कुछ भी नहीं




जब ज़िन्दगी ठहर जाती है 
नदी किनारों से परे 
बेवजह कलकल करती है 
तो न सन्नाटे बोलते हैं 
न शोर ही सुनाई देता है ...
उपदेशकों की भीड़ 
और तन्हा मन -
कोई चेहरा भी दिखाई नहीं देता .
चीख बुझ गई है 
आग रुक गई है 
किसी का कोई इंतज़ार नहीं !
मोह की बेड़ियाँ तो अब स्वतः खुलने लगी हैं 
कभी पूछ बैठूँ 
कि कौन हो तुम ....
तो हँसना मत 
अब हँसी भी मुझे दिखाई सुनाई नहीं देती !
आवारा सड़कों से दूर 
सभ्यता से भरे कमरे में 
मैं ढूंढती रही वह लफ्ज़ 
जो मुझे सुकून दे सके 
अब तो आईने ने भी मुझे दिखाना बंद कर दिया है !
क्यूँ घूर रहे मुझे ?
विश्वास नहीं होता ?
चलो छोड़ो -
इस विश्वास,अविश्वास से भी कुछ नहीं होता 
सच कुछ भी नहीं  
शायद आत्मा की अमरता भी छलावा है 
सिर्फ छलावा !!!

29 मार्च, 2013

यादों ने कहा



कल रात कुछ यादें सुगबुगायीं 
पूछा - खैरियत तो है ?
मैं मुस्कुराई ....
यादों को हौसला मिला 
बोलीं - 
"मैं व्यक्तिगत जीवन में हस्तक्षेप नहीं करती 
पर तुम्हारी लम्बी खामोशी 
व्यक्तिगत तो नहीं लगती ! ....
तुम शोर के सैलाब में बह गई हो तिनके के सामान 
.....
तुम्हारा यह बहना तुम्हारे लिए नहीं 
उनके लिए है - जो तिनके की तलाश में 
बदहवास हाथ-पाँव मारते हैं !!
तुम उन्हें एक पल का किनारा देना चाहती हो 
अविश्वास की आँधियों के बीच 
एक पल भी कितना मुश्किल है 
पर तुम उसे देने के लिए 
सुनामियों में बह रही हो .....
....
तुम्हें याद भी है 
मेरे दरवाज़े .... अरसे से तुम नहीं गुजरी 
कितने द्वार प्रतीक्षित हैं 
और तुम्हारी आहट ..... कितनी चुप है 
यह चुप्पी -
घुमावदार 
अनगिनत सोच की लकीरें न खींचती जाए 
बेवजह कोई सोच पहाड़ हो जाए 
फिर ? .... फिर क्या करोगी ?

तिनके की तरह तैरना गलत नहीं 
पर !!! कुछ दूर चलो तो सही 
थके मन की मुस्कान बनो 
कुछ कहो तो सही ...
बहुत हुआ - अब ये ख़ामोशी तोड़ो 
शब्दों के अर्घ्य से 
भावनाओं की तिलस्मी गुत्थियाँ खोलो 
शब्दों के रिश्तों में प्राणप्रतिष्ठा करो ..........."

23 मार्च, 2013

सुनामी हर किसी के हिस्से होती है




यीशू 
तुमने कहा था -
'पहला पत्थर वह चलाये 
जिसने कभी कोई पाप न किया हो ...'
तुम्हें सलीब पर देख आंसू बहानेवाले 
तुम्हारे इस कथन का अर्थ नहीं समझ सके 
या संभवतः समझकर अनजान हो गए !
अपना पाप दिखता नहीं 
प्रत्यक्ष होकर भी वचनों में अदृश्य होता है 
तो उसे दिखाना कठिन है ...
पर दूसरों के सत्कर्म भी 
पाप की संज्ञा से विभूषित होते हैं 
उसे प्रस्तुत करते हुए वचनम किम दरिद्रता” !

दर्द को सुनना 
फिर उसके रेशे रेशे अलग करना 
 संवेदना नहीं 
दर्द का मज़ाक है 
और अपना सुकून !

बातों की तह तक जानेवाले 
बातों से कोई मतलब नहीं रखते 
बल्कि उसे मसालेदार बनाकर 
दिलचस्प ढंग से 
अपना समय गुजारते हैं ...

वितृष्णा होती है !!!
किसी और में कमी देखने से पहले 
खुद को देखना कभी नहीं आया 
जाने कबीर ने क्या सोचकर अपने भावों को रखा 
'बुरा जो देखन मै चला, बुरा न मिलिया कोय 
जो मन खोजा आपना ,मुझसे बुरा न कोय'....
.....
कबीर को क्या पता कि कोई खुद को बुरा नहीं मानता 
हाँ उनकी पंक्तियाँ रेखांकित हो गईं 
अपरोक्ष दूसरों को बुरा जताने में !
गलती छोटी-बड़ी सबसे होती है 
पर निशाने पर -
हमेशा दूसरा होता है 
सूक्तियां खुद को आदर्श दिखाने के लिए होती हैं 
आदर्श बनने के लिए नहीं !
सुनामी हर किसी के हिस्से होती है 
देर सबेर उससे गुजरना होता है 
और जब गुजरो 
सही मायनों में सीखने समझने का वही सवेरा होता है  ....

28 फरवरी, 2013

सब दिन होत न एक समान !!!




पति-पत्नी 
भाई-भाई 
बुज़ुर्ग- युवा,बच्चे ....
रिश्ते क्यूँ टूटे 
क्यूँ हल्के हैं 
जानने के लिए 
- गड़े मुर्दे से कारणों को निकालने पर 
सिर्फ दुर्गन्ध आएगी 
तू तू मैं मैं के वीभत्स स्वर सुनाई देंगे 
और सही कारण लुप्त रहेगा 
और टूटने का पानी नाक तक आ जायेगा ...

तुम मन बहलाने के लिए 
यूँ कहें - मज़ा लेने के लिए 
प्रतिस्पर्द्धा की तृप्ति के लिए 
गड़े मुर्दे उखाड़ो 
अपनी मंशा शांत करो 
किसी के दर्द का मज़ाक उड़ाओ 
पर एक बार गिरेबान में देखो 
तुम भी न पतिव्रता हो न पत्नीव्रता
न श्रवण,न भरत 
क्योंकि क्षुद्र मानसिकतावाले ही 
दूसरों के दर्द में कुटिल मुस्कान बिखेरते हैं !
जो दर्द के समंदर से जा मिलते हैं 
वे आनेवाली नदियों का मर्म समझते हैं !!

टूटे रिश्तों के कारण 
हताशा में हुए प्रलाप में नहीं दिखते 
प्रलाप तो एक सुनामी है 
सत्य का भी,झूठ का भी 
बारीकी से अगर तुम टूटे नहीं कभी 
तो बारीकी से समझना सहज,सरल नहीं !
बेवजह चर्चा गोष्ठी बैठने,बैठाने का कोई अर्थ नहीं 
जिस रिश्ते को व्यक्तिविशेष निभाना नहीं चाहता 
उसे समाज,परिवार्,बच्चे ....
किसी का भी हवाला देकर निभाने की सलाह सही नहीं 
क्योंकि उसकी चिंगारियां 
समाज,परिवार,बच्चों के जिस्म और मन पर पड़ती हैं 
और घर' शमशान हो जाता है ....

किसी रिश्ते को तोड़ने से पहले 
तथाकथित तोडनेवाला 
स्वयं असह्य मानसिक द्वन्द से गुजरता है 
हर खौफ उसके जेहन में उभरता हैं 
टूटने से पहले वह कई मौत मरता है 
तब अकेलेपन को चुनता है 
सन्नाटे से दोस्ती करता है ..........

गड़े मुर्दे समान दर्द को कुरेदकर 
उसकी कहानी सुनकर 
फिर यह कहावत दुहराकर 
कि - ताली एक हाथ से नहीं बजती ....
क्या मिलेगा तुम्हें?
तुम ठहाके लगाओ 
या मगरमच्छी आंसू बहाओ 
दर्द सह्नेवाले शून्य हो जाते हैं 
और उनकी शून्यता से बिना उनके चाहे 
एक आवाज़ आती है तुम जैसों के लिए 
- सब दिन होत न एक समान !!!


24 फरवरी, 2013

स्त्री तुम और वह



तुम्हें टुकड़े कीमती लगे 
जिसने टुकड़े फेंके थे 
तुमने उसके सजदे में 
अपना ईमान गँवा दिया !

आंसुओं से धुंधले पड़े जमीन से 
वह अपने बच्चों के लिए 
टुकड़े उठाती गई 
तुमने अपनी ठहाकों में 
उसकी हिचकियों को बेरहमी से मार दिया 
अपने सड़े -गले तराजू पर 
तुम एक माँ की परिस्थितियों का हिसाब किताब 
और न्याय करते गए !

उस माँ ने आँख उठाकर 
हिकारत से भी किसी को देखना 
अपने स्वत्व के खिलाफ माना 
और तुमसब हर रोज 
उसकी हार का तमाशा देखने को बेताब रहे !!

इतने कुत्सित चेहरों के मध्य भी 
जो जीना चाहे 
नयी जान की साँसों के लिए 
उसकी हार कभी नहीं होती 
उसकी खामोश सिसकियाँ 
हाय' बन जाती है
देखते देखते उसकी धरती हरी हो जाती है 
और तुम्हारा सबकुछ सोने की लंका के समान 
जलकर राख हो जाता है !!!

कमज़ोर काया में 
अडिग क्षमता होती है 
आज नहीं तो कल 
उसकी निरीह दिखती 
हास्यास्पद लगती खुद्दारी 
स्वाभिमान के असंख्य दीप जलाती है ...

अभी भी समय है 
सोचो 
वह ऊपर वाला मौके देता है 
जो टुकड़े फेंकने का तुम्हें अभिमान है 
वह तुम्हारा नहीं 
उसका है 
वह जब देता है 
तो तुम्हें आजमाता भी है 
भक्ति में देवत्व है या नहीं 
यह आकलन उसका होता है !!!

14 फरवरी, 2013

फिर आया प्यार का दिन :)


लो फिर आया प्यार का दिन 
और ऋतुराज बसंत 
प्यार की राह में 
लाल गुलाब के लफ्ज़ लिए हीर रांझे को ढूंढ रहे  ....
अरे बसंत 
जिधर नज़र डालो उधर गले में बांह डाले प्यार 
जिल्लेइलाही को ठेंगा दिखा रहा है !
तुम किस दौर में झूम रहे ?
फूलों के जहाँपनाह 
अब कलियाँ भौरों का इंतज़ार नहीं करतीं 
भौंरों के पीछे दौड़ जाती हैं 
पहले तो एक नज़र के दीदार को तरसते थे न प्रेमी 
अब ..... एक गुलाब से भी दिल नहीं भरता ....
ओह बसंत -
इस प्यार वाले दिन 
पहली तारीख की सैलरी जैसी ख़ुशी होती है 
अरे हाँ वही अंग्रेजी में वैलेंटाइन डे ....
बित्ते भर कपड़ों में हीर 
उजड़े बालों में रांझे 
बिजली के तार से बिखरे मिलते हैं 
अजी किसकी मजाल है 
जो उनके बीच में आये !
मुश्किल से मिले इज़हार के दिन को 
जी भरके जीते हैं आज के रांझे और हीर 
एक फूल इसको एक फूल उसको 
दोनों तरफ अप्रैल फ़ूल का गेम चलता है  !
फूलवाले की चांदी,
टेडी बिअर की दूकान में भीड़ ही भीड़ 
पुलिसवाले भी पकड़ने लगते हैं प्रेमियों को 
ताज़ी खबर के लिए 
जबकि यह तो हर दिन का नज़ारा है 
...........
आह !
खो गई सब चांदनी रातें 
दोपहर की धूप में धीरे से छत पर पहुंचने की कोई कवायद नहीं 
कैसे कहें हाल की समस्या नहीं .......
अमां बसंत,
मोबाइल पर फटाफट चलती उंगलियाँ 
आधी रात तक महाकाव्य लिखती हैं प्यार का 
और वैलेंटाइन तो स्टाइल है 
प्रेम को सरेराह दिखाने का 
तो आराम से देखो -
फिर आया है प्यार का दिन 

11 फरवरी, 2013

चलो एक डायरी बनायें



चलो यादों की एक डायरी बनायें 
कुछ टिकोले कुछ कच्चे अमरुद में 
थोड़ी सी नमक मिलाएं ...
आँखें बंद 
और 20 25 साल .... नहीं नहीं 
उम्र के हिसाब से मन को पीछे ले जाएँ :)
बड़ा सा खुला मैदान 
हरी हरी घासें 
बीच बीच में साफ़ सुथरी मिटटी का हिस्सा 
उसमें लकीरें बनायें 
इक्कट दुक्कट खेलें 
घास पर बैठकर रुमाल चोर खेलें 
हार जाने पर दिल खोलकर झगड़ें 
बाल खींचें 
हाथ पैर चलायें 
दांत काटने पर अम्मा को बुलाएँ ....
पापा के वादों का पन्ना भी इसमें जोड़ें 
'गलती कबूल कर लेने पे मार क्या 
डांट भी नहीं पड़ेगी' ...
एक बार फिर उनका कीमती चश्मा तोड़ 
गलती कबूल कर 
उनके वादे को भुनाएं :)
....... ओह ! गुस्से से उनकी लाल लाल आँखें 
और वचनबद्ध स्थिति 
आज भी तपती धूप में 
पानी के छींटे सी लगती है 
तो चलो डायरी में कुछ पानी के छींटों को भी जज़्ब करें 
यादों का मीठा एल्बम बना दें उसे ! ...
मउगे के आने का भी एक पन्ना बनायें 
..... मउगा !!! छोटे से बक्से में औरतों के सामन बेचता था 
तो - कौन है ?पूछने पर खुद कहता था - मउगा !
उसका छोटा सा बक्सा एक पिटारा था 
रीबन,बिंदी,क्लिप,नेलपौलिश,सेफ्टीपिन,....
खुशियों का संसार लगता था वो बक्सा 
.... आओ पहले की तरह उसे घेरकर बैठ जाएँ 
वहां से उठकर दहीवाले की हांडी से दही निकालें  
उसके हताश होने पर ठहाके लगायें!
समय की प्रतिकूलता में 
भईया के दूर जाकर पढने से हुई उदासी में 
उसके आने पर बनते मैन्यू की ख़ुशी का पन्ना जोड़ें 
क्रिकेट न आने पर भी 
क्रिकेट खेलते हुए 
उसकी कैप्टेन होने का भी रूतबा जोड़ें :)
...
भैंस पर रोते हुए चरवाहे की गालियाँ 
निम्बू के फांक से लेमनचूस 
आम की गुठली को सफ़ेद करना 
.... फिर ....
उस जगह से दूसरी जगह जाना 
उमड़ता समूह 
राम वनवास की ही याद दिला गया था !
करीने से इन सबको जोड़ना है 
यूँ जुड़े ही हैं 
पर एक यात्रा डायरी बनाने की कर लें 
तो हर्ज़ ही क्या है !
छोटे छोटे गम 
छोटी छोटी खुशियाँ 
आँखों को नमी 
होंठों को जो मुस्कान देती हैं 
वे अनमोल होती हैं 
.....
मुझे अपने घर का फ्रेम कैद करना है 
क्रिकेट बॉल 
तमतमाए लड़े हुए चेहरे 
बेफिक्र हंसी 
बिछावन पर खाना 
नए कैसेट लाना 
...ओह !
ये दिन बदल जायेंगे 
तब कहाँ लगता था 

खैर!

तुम अपनी डायरी बनाओ 
मैं अपनी डायरी में लग जाती हूँ 
बहुत बड़ा काम है यह 
कितनी बातें कोने में अभी भी छुपी हैं 
खोजना है आइस बाइस करके 
....... :)
यादों की खूबसूरत विरासत सी डायरी के लिए 
चलो एक बार जमके खेलते हैं पीछे के मैदान में 
..............
..............
..........

05 फरवरी, 2013

कोई शक्ति होती है



कोई शक्ति होती तो है ...
शक्ति - अद्वैत की 
जिसकी सरहद पर होती है बातें 
आत्मा की परमात्मा से ...
मैं सुन सकूँ उस शक्ति को 
शायद या संभवतः इसीलिए 
अबोध बचपन में मैं शमशान से गुजरी 
ओह !.... 
निःसंदेह अपार भय मेरे संग था 
पर वहां सोये अपने छोटे भाई से मिलने 
अपनी माँ की वेदना के संग 
मैं ही नहीं ..... हम सारे भाई बहन जाते थे !
मैं नहीं जानती औरों का अनुभव 
पर मेरे साथ कोई लौटता था 
हर घड़ी उसका साथ रहना भय था 
या सत्य ..... इससे परे 
मैं उससे बातें करती 
मुझ जैसे साधारण अस्तित्व का डरना 
साधारण सी ही बात है 
पर इस भय के मध्य वह कुछ ऐसा बताता कि 
..... बहुत अनोखा 
अजीब सा लगता 
पर आत्मा भूत ईश्वर के मध्य 
ऐसी कई अनुभूतियाँ सबसे परे लगतीं !
जब जब अँधेरा होता 
ये अनुभूतियाँ 
एक ही बार में कई पतवारों पर 
अपनी अद्भुत सशक्त पकड़ रखतीं 
मैं भले ही घबरा जाऊं 
इनसे दूर भागने की 
छुपने की कोशिश करूँ 
इन्होंने वो सारे दृश्य उपस्थित किये 
जहाँ इनकी ऊँगली ही मेरी दिशा बनी !

धीरे धीरे मैंने जाना 
कि न जन्म है न मृत्यु 
हर कार्य का है प्रयोजन ...
शरीर नश्वर कहाँ 
इसका प्रत्येक सञ्चालन 
आत्मायुक्त परमात्मा से है !
जो नष्ट होता है 
वह भ्रमजाल है 
वियोग- मायाजाल 
जब हम अपने भ्रम को स्वीकार कर लेते हैं 
वियोग से समझौता कर लेते हैं 
तब होता है दूसरे चरण का आरम्भ !

.... सत्य का प्राप्य प्रत्यक्ष जो भी दिखे 
सत्य के प्रत्येक पल में 
प्रभु का हाथ सर पे होता है 
रक्त की एक एक बूंद में 
वह अमरत्व घोलता है ....
सत्य को ठेस -
इसके पीछे भी ईश्वर का करिश्मा ...
झूठ के संहार के लिए 
उसके अपरिवर्तित रूप को उजागर करना होता है 
कोई भी असुर हो 
उसे पहले अपरिमित शक्ति दी जाती है 
फिर अहंकार के आगे संहार के रास्ते 
स्वतः खुल जाते हैं ....

मैंने देखा,मैंने जाना,मैंने महसूस किया 
परछाईं की तरह वह रहस्य 
यानि ईश्वर 
साथ साथ चलता है 
ज्ञान से परे कई अविश्वसनीय तथ्य देता है 
मस्तिष्क मृत 
शरीर जाग्रत  
यह सब यूँ हीं नहीं होता 
मृत संवेदनाओं को जगाने के लिए 
अनोखी जडी बूटियों से 
साँसों को चलाना भी पड़ता है ....
.........
:)
मैं स्वयं हूँ कहाँ ???

30 जनवरी, 2013

आतंक के निकट



प्रेम तो ताकत है 
जीवन की पूर्णता है 
आंधी के मध्य भी जलनेवाला अद्भुत दीया !
..........
मैं तो जीती आई  हूँ बरसों 
- एक काल्पनिक प्रेम में 
जिस तरह पत्थर,मिटटी,कूची से 
भगवान् की प्रतिमा बनाते हैं 
उसी तरह मैंने एक चेहरा बनाया अदृश्य में 
कोई नाम नहीं दिया 
और प्रेम की अमीरी में 
रास्तों को कौन कहे 
खाइयों को पार कर लिया 
पर ..... हादसों को आत्मसात करता मन 
अचानक प्रेम से उदासीन हो उठा है -
प्रेम !!!
उन लड़कियों ने भी तो प्रेम चाहा होगा न जीवन में !
.........
जो युवा बेमानी कानून के आगे दम तोड़ देते हैं 
उन्होंने भी प्रेम चाहा होगा न !
पर उनके नाम 
उनके परिवार के नाम 
दहशत और आंसू लिख दिए गए 
व्यवस्था और परिवर्तन के नाम पर !
अचानक किसी मानसिक बीमारी की तरह 
प्रेम शब्द से वितृष्णा हो गई है 
यूँ कहें -
प्रेम की भाषा ही भयानक हो गई है !
..........
चालाकी के समर्पण ने 
विकृत ठहाकों के अंधे कुएं में 
कई कल्पनाशील चेहरों को ज़िंदा दफ़न कर दिया है 
मैं हर दिन उस कुएं में झांकती हूँ 
दबी घुटी चीखें मेरे होठों पर थरथराती है 
आँखों से बिना किसी सूचना के 
आंसू टपकते हैं 
मुझे उस अंधे कुएं से अलग कुछ नज़र नहीं आता 
पर ........ मैं असहाय हूँ 
कुछ नहीं कर पाती,..... 
कुछ कर भी नहीं सकती -
सिवाए महसूस करने के ...
और महसूस करने से 
न कोई जिंदा होता है 
न हादसे रुकते हैं 
विकृतियाँ सरहद के पार ही नहीं 
हर गली मोहल्ले शहर में घूमती हैं 
- - - - - मैं ही नहीं 
जाने कितने चेहरे मौत की तरह खामोश हो चले हैं ...
गाहे-बगाहे मेरी तरह 
'मैं हूँ','मैं हूँ' कहते हैं 
और भरभराकर एक कोने में सिमट जाते हैं !
विषैली हवाओं के आगे 
सामर्थ्य की साँसें मिट रही हैं 
कौन अगले कदम पर खो जायेगा 
............. आहट भी नहीं है ..............

22 जनवरी, 2013

उसके बाद ?



मैं .... और मैं 
वार्तालाप,प्रलाप 
प्रश्न,प्रश्नोत्तर,निरुत्तर ....
सत्य-असत्य 
पाप-पुण्य 
स्वाभिमान,अभिमान 
सुकर्म,कुकर्म 
.... सबकी दिशाएं मैं के बिंदु से आरम्भ होती हैं !
पेड़,पहाड़,धरती,आकाश,वायु,जल ...
एक विस्तार है 
एक विषय है 
चयन मैं का ....
मैं से निर्धारण न हो 
तो सफलता की गुंजाइश 'ना' के बराबर . 
........
गुंजाइश हो भी तो भी 
आत्मिक,मानसिक,दिमागी उथल-पुथल 
कंक्रीट बिछाते रहते हैं 
तोड़-फोड़,निर्माण का क्रम अनवरत 
.... जब तक जीवन - तब तक दृश्य प्रश्न 
परोक्ष-अपरोक्ष उभरते हैं,मिटते हैं 
सही-गलत समय की परिभाषा है 
जिसे किसी भी हाल में हम तय नहीं कर सकते 
मैं ......... समय के हाथ में है 
तुम कह सकते हो 
'जहाँ हो - वहीँ रहो'
पर समय मैं के साथ खड़ा 
कूद जाने को बाध्य कर सकता है 
अन्याय का विरोध मान्य है 
सही भी है 
पर विरोध करने पर मृत्यु का पुरस्कार मिले 
तो मैं 
हम को क्या सलाह देगा 
यह मैं ही समझ सकता न !
..........................
...............................
......................................
यह प्रक्रिया आम है 
दिनचर्या है 
थकान है 
परिणाम - मूक सोच !
सह जाना सही है 
चिल्लाना सही है 
या कानून की मदद ?
....
50 की उम्र रेखा पार करके 
मैं सच में नहीं समझ सकी 
फैसला कौन लेगा -
मैं,मैं,मैं या ............हम ?
चुप्पी सही या चीख ?
खुद पर कुछ सह लेना असहज होकर भी 
सहज है 
पर बच्चे और अपने ?
उस आंधी में तय नहीं होता 
कि तेज हवाएं खामोश हो जाएँगी 
या खामोश कर देंगी 
..........
उसके बाद ?

15 जनवरी, 2013

मैं 'हाँ' भी मैं 'ना' भी



मैं 'हाँ' भी 
मैं 'ना' भी ...
स्वाभाविक भी है 
समंदर में ही विष भी 
अमृत भी 
मंथन अनवरत -
कभी दिल का 
कभी दिमाग का 
..........परिस्थितियों के अनुसार .........
मैं ही कहती हूँ - गलत तो हर हाल में गलत है !
मेरा ही मानना है - परिस्थितियाँ उस वक़्त सही होती हैं !
कोई मारता है स्वभाववश 
कोई बचाव में ..
तो व्याख्या,न्याय,संस्कार दोनों में एक नहीं होते न !
मैं कहती हूँ जिसे - सही है 
फिर कहती हूँ -  हालात से उत्पन्न है
सही है या गलत 
लगता है मस्तिष्क सुन्न हो गया !
.......
ताली एक हाथ से नहीं बजती अन्याय में 
सही है - 
सहनशीलता बढ़ावा है 
ताली का जरिया है ...
पर नहीं सहा तो ?
माता - पिता के लालन-पालन पर ऊँगली उठेगी !
ऊँगली उठाना आसान है - 
तो क्या करना है - कैसे तय हो !
......
मैं लकीरें खींचती हूँ 
और तत्क्षण मिटा देती हूँ 
क्योंकि समय के साथ लकीरें बेमानी हो जाती हैं 
मुक्ति और विरक्ति में फर्क है 
मोह पर विजय प्राप्त करना 
और मोह के सिंहासन पर मुक्ति का उपदेश देना 
एक ही बात कहाँ होती है 
बिल्कुल नहीं होती है !
सिद्धार्थ से गौतम की यात्रा सबसे सम्भव नहीं ...
तप और तप का ज्ञान 
फर्क है न 
तो मैं कभी हाँ तो कभी ना हो ही जाती हूँ 
एक ही पलड़े पर बुद्ध और ढोंगी को नहीं रख सकती 
बुद्ध को तलाश थी सत्य की 
और बुद्ध के वेश में ....... सत्य की हत्या 
विरोधाभास है !
पूजा मन की श्रद्धा है 
शोर नहीं 
दिखावा नहीं !
मैं ईश्वर से बातें करती हूँ 
पर डरती भी हूँ 
अकुलाती भी हूँ 
अंधविश्वास से क्षणांश को ही सही 
ग्रसित भी होती हूँ 
फिर लगता है - क्या बकवास सोच है मेरी !
आगत दिखता है 
फिर अचानक कुछ नहीं दिखता 
और यहीं मेरी गलतियां 
मुझसे हिसाब किताब करती हैं !
सोच से परे दृश्य उपस्थित होने के कारण तो हैं ही 
ज़िम्मेदार मैं 
सज़ावार मैं 
स्तब्द्ध मैं 
निर्विकार मैं 
अँधेरे में एकाकार मैं 
शायद इस हाँ ना की वजह से ही 
सूरज रोज मेरी आँखों के आगे चमकता है 
और अँधेरे को चीरकर 
मैं खुद को प्रभु के चरणों में समर्पित कर देती हूँ 
मेरी हाँ - मेरी ना की वजह वही है 
अँधेरा कितना भी गहरा हो 
वह मेरे भीतर प्रकाशित रहता है 
..........
शब्द उसके - मैं माध्यम 
हाँ और ना की 
एक ही विषय पर 
एक ही क्षण में ........!!!
... 

10 जनवरी, 2013

मुझे कहना तो है - पर क्या ?




मुझे कहना तो है - पर क्या ?

मौन - एक विस्तृत धरा 
मन सोच के बीज लिए चलता है 
धरा उसका साथ देती है 
कई खामोश पौधे,वृक्ष 
अपनी अनकही भावनाओं के संग लहलहाते हैं 
कहीं तो होगा कोई मौन सहयात्री,पथिक 
जो इन खलिहानों से एक अबूझ रिश्ता जोड़ेगा !
..........
ले आएगा उस चेहरे को 
जिसे माँ ने आशीर्वचनों से सुरक्षित किया था 
ले आएगा उन बहनों को 
जो अपने वीर को सुरक्षा स्तम्भ मानती हैं 
ले आएगा गाँव के उन रिश्तों को 
जहाँ पराया कोई नहीं होता ...
....
मुझे कहना तो है - पर क्या ?

माँ,पिता,पत्नी,बहन,बच्चा ......
सब की आँखों से बह रहा है सवाल 
कैसे मान लूँ और क्यूँ 
कि यह आधा शरीर हमारे घर का है ?
हमने तो दुआओं के धागे बांधे थे 
बलैया भी ली थीं ...
ये इतनी सर्दी में क्यूँ मेरे दरवाज़े 
इतनी कठोर सज़ा मुझे दे रहे 
....... हमने तो ईमानदारी से देश को अपने घर का चिराग दिया था 
पूरा तो लाने का धर्म निभाता देश !
.........
मुझे कहना तो है - पर क्या ?

औरतें ईश्वर के आगे बुदबुदा रही हैं -
'बाँझ ही रखना - कबूल है 
पर बेटी मत देना 
उसकी ऐसी दर्दनाक मृत्यु मैं नहीं देखना चाहती 
नहीं सुनना चाहती शर्मनाक बौद्धिक विचार 
और ............ मुझे भी उठा लो 
क्योंकि सारे रास्ते जंगल हो गए हैं 
..............'

मुझे कहना है - पर क्या 
मन की आशंकाओं को हे प्रभु 
कालिया नाग की तरह क्षीण करो 
अपने नाम पर होते अत्याचारों पर 
सुदर्शन चक्र चलाओ 
धर्म के गलित गुरुओं को जरासंध की तरह मारो 
सरकार की कुटिल विवशता का विनाश करो 
नहीं .............
तो माँ की मांग स्वीकार करो 
प्रभु उपकार करो 
उद्धार करो 
अवतार धरो .......................