25 जून, 2017

रामायण है इतनी




रूठते हुए 
वचन माँगते हुए 
कैकेई ने सोचा ही नहीं 
कि सपनों की तदबीर का रुख बदल जायेगा 
दशरथ की मृत्यु होगी 
भरत महल छोड़ 
सरयू किनारे चले जायेंगे 
माँ से बात करना बंद कर देंगे  ... !
राजमाता होने के ख्वाब 
अश्रु में धुल जायेंगे !!

मंथरा की आड़ में छुपी होनी को 
बड़े बड़े ऋषि मुनि नहीं समझ पाए 
 तीर्थों के जल 
माँ कौशल्या का विष्णु जाप 
राम की विदाई बने  !!!

एक हठ के आगे
राम हुए वनवासी 
 सीता हुई अनुगामिनी 
लक्षमण उनकी छाया बने  ... 
उर्मिला के पाजेब मूक हुए 
मांडवी की आँखें सजल हुईं 
श्रुतकीर्ति स्तब्ध हुई  ... 
कौशल्या पत्थर हुई 
सुमित्रा निष्प्राण 
कैकेई निरुपाय सी 
कर न सकी विलाप 

इस कारण 
और उस कारण 
रामायण है इतनी 
होनी के आगे 
क्या धरती क्या आकाश 
क्या जल है क्या अग्नि 
हवा भी रुख है बदलती 
पाँच तत्वों पर भारी 
होनी की चाह के आगे 
किसी की न चलती  ... 

21 जून, 2017

शीशम में शीशम सी यादें




छोड़ कैसे दूँ
उस छोटे से कमरे में जाना
जहाँ
पुरानी
शीशम की आलमारी रखी है
धूल भले ही जम जाए
जंग नहीं लगती उसमें  ... !
न उसमें
न उसमें संजोकर रखी गई यादों में
!
जब भी खोलती हूँ
एक सोंधी सी खुशबू
चिड़िया सी फड़फड़ाती
कभी मेरी आँखों को मिचमिचा देती है
कभी कंधे पर बैठ
कुछ सुरीला सा गाती है
कभी चीं चीं के शोर से
आजिज कर देती है  ...
!
लेकिन अगर जाना छोड़ दूँ
तो
अनायास मुस्कुराने का सबब
कहीं खो जायेगा
छुप जायेगा बचपन
किसी कोहरे में
अमरुद की डालियाँ
कच्चे टिकोले
लू में कित कित खेल की ठंडक
पानीवाला आइसक्रीम
कान का उमेठा जाना
और  ...
फिर से शैतानियों को दुहराना !

ये शीशम की लकड़ी से बना
यादों का ख़जाना
रुलाता है
हंसाता है
कहता है -
अगर घुटने छिले थे
तो शैतानियों का रंग भी लगाया था न सबको
अंतराक्षरी
स्टेज शो
माँ का आँचल
पापा की मुस्कुराहट
जाने क्या क्या रखा है मुझमें तुमने ही  ...

सच है
जाने कितने चेहरे
कितनी खिलखिलाहटें
कितने झगड़े
कितनी शिकायतें
शीशम की आलमारी में है
इस छोटे से कमरे का वजूद
इस ख़ज़ाने से ही है
न आऊँ किसी दिन
तो कुछ खोया खोया सा लगता है
खोना तो है ही एक दिन
उससे पहले पाने का सुख क्यों खो दूँ
छोड़ कैसे दूँ
उस छोटे से कमरे में जाना !!!

16 जून, 2017

सौ बार धन्य है वह लवकुश की माई




 मैं शबरी
फिर प्रतीक्षित हूँ
कि राम आयें  ...
...
नहीं नहीं
इस बार कोई जूठा बेर नहीं दूँगी
मीठा हो या फीका
यूँ ही दे दूंगी खाने को
नहीं प्रदर्शित करना कोई प्रेम भाव
मुझे तो बस कुछ प्रश्न उठाने हैं

- "हे राम
तुमने अहिल्या का उद्धार किया
कैकेई को माफ़ किया
उनके खिलाये खीर का मान रखा
 चित्रकुट में सबसे पहले उनके चरण छुए
जबकि उनकी माँग पर ही
राजा दशरथ की मृत्यु हुई थी
...
फिर सीता की अग्नि परीक्षा क्यूँ ?
किसकी शान्ति के लिए ?
सीता का त्याग
किसकी शान्ति के लिए ?
प्रजा के लिए ?
मर्यादा के लिए ?

हे राम,
उस प्रजा को
रानी कैकेई के चित्रकुट जाने पर
 कोई ऐतराज नहीं हुआ था ?

जिस सीता के आगे
रावण संयमित रहा
उस सीता के आगे
उनके अपने !!!
कलयुग का अँधा कानून कैसे बन गए ?
ऐसा था -
तो जिस तृण ने
माँ सीता का मान रखा था
क्या उस तृण की गवाही नहीं हो सकती थी ?
त्रिजटा थी उस अशोक वाटिका में
उससे ही पूछ लेना था सच !!

हे प्रभु
तुम्हें तुम्हारे रघु कुल की कसम
सच सच बताना
अगर अग्नि परीक्षा में माता जल जाती
तो क्या उनका सतीत्व झूठा हो जाता ?"

देखूँ - राम के न्यायिक शब्द
उनके मन के किस गह्वर से निकलते हैं
जिन्होंने कहा था,
सौ बार धन्य है वह एक लाल की माई
जिस जननी ने है जना भरत-सा भाई।"(मैथिलीशरण गुप्त )

मैं शबरी आज कहना चाहती हूँ
"सौ बार धन्य है वह लवकुश की माई
जिसने वन में उनको कुल की मर्यादा सिखलाई"



04 जून, 2017

एक उम्र की दिनचर्या और सोच




चलो कहीं बाहर चलते हैं
सुनते ही मन खाली हो जाता है
दूर दूर तक
कोई सीधी सड़क नज़र ही नहीं आती
न पेड़ों का समूह
न अपनेपन की हवा
बड़बड़ाने जैसा
होठों से फिसलते हैं शब्द
- कहाँ जाना !!!

जानती हूँ,
यह अच्छी बात नहीं
पर,
पहले जैसी कोई बात भी तो नहीं
न किसी से मिलने का मन
न बातों का सिलसिला
अकेला रूम अब आदत में शुमार है !

एक कुर्सी
कुछ भी खाने के लिए
शाम का इंतज़ार
बीच बीच में फ़ोन
छोटी
लम्बी बातचीत  ...
बाहर सबकुछ शांत
भीतर हाहाकार
!!!
प्रश्नों का सैलाब
यादों की लहरें
अनहोनी की सुनामी
कभी आँखें शुष्क रह जाती हैं
कभी होती हैं नम
कुछ बताते हुए किसी को
अचानक लगता है,
क्या व्यर्थ साझा किये जा रहे
... इसी तरह
रोज रात आ जाती है
घड़ी पर नज़र जाते
दिल धक से बैठ जाता है
कुछ दवाइयाँ गुटक कर
टुकुर टुकुर छत देखते हुए
करवट लेती हूँ
बीच में पुनः करवट बदलने के दरम्यान
यह ख्याल मन को सुकून देता है,
वाह, मुझे नींद आ गई थी !
कब?
हटाओ यह प्रश्न
 आ गई - यह बड़ी बात है
और एक नया दिन फिर सामने है  ...

15 मई, 2017

वह लड़का




कहानी के काल्पनिक पात्रों को
परदे पर देखकर
हमने बहुत आँसू बहाये
बड़ी बड़ी बातें की
बड़े बड़े लेखकों के विषय में
अपनी अपनी जानकारी के पन्ने खोले
...
लेकिन वह लड़का
जो अचानक हादसे की चीख से
अपनों के आँसुओं के बीच से
सुरक्षित दूर भेज दिया गया
उसके बारे में किसी ने सोचा ?!

लड़ते-झगड़ते
डरते खेलते
सुरक्षा के नाम पर
वह बहुत अकेला हो गया !
किसने मज़ाक बनाया
किसको देखकर
उसके मन में क्या आया
हादसे की चीखें उसके मन से
किस तरह गुजरती रहीं
वक़्त पर वह बाँट नहीं पाया  ...
बस करता रहा छुट्टियों का इंतज़ार
और जब खत्म हो गई छुट्टियाँ
वह समझदारी के लिबास में
लौटता रहा  ... !

उम्र कहाँ रूकती है
गिरते-उठते
न उठना चाहो
तब भी उठकर
आगे बढ़ ही जाती है
ठहरा रह जाता है
वह अनकहा
जो सबकी बातों में
अपने अकेले हो गए बचपन को
एक बार देखना चाहता है
क्षणांश के लिए ही सही
उन वर्षों को जीना चाहता है
कुछ कहना चाहता है ! ...

कभी तौला है अपने एकांत में
अपनी अनुमानित आलोचनाओं से हटकर
कि
उसकी भी कुछ इच्छाएँ होंगी
उसके उतार-चढ़ाव ने
उसे भी बोझिल किया होगा
उसके आवेश में
उसकी भी मनःस्थिति होगी
या चलो आदत ही सही
जिसे अपने लिए सोचकर
मुहर की तरह जायज बना दिया हमने !
...
अनदेखे पात्रों को
गहराई से सोचकर क्या
यदि हमने देखे हुए
साथ चले हुए शख्स को
गहराई से नहीं लिया  ...

 मेरी नज़र से
हमारे भीतर कोई समंदर नहीं
कोई नदी नहीं
हाँ,
छोटे छोटे गड्ढे हैं
जो समय-असमय की बारिश में
पल में भरते हैं
पल में खाली हो जाते हैं
... --- ===


10 मई, 2017

मेरे होने का प्रयोजन क्या है !!!



प्रत्यक्ष मैं
एक पर्ण कुटी हूँ
जहाँ ऐतिहासिक महिलाओं के
कई प्रतीक चिन्ह
खग की तरह
विचरण करते हैं  ...
खुद से परोक्ष मैं
नहीं जानती
मैं हूँ कौन !
क्या हूँ !
क्या है प्रयोजन मेरे होने का !

मेरी आत्मा
एक विशाल हवेली
अदालत की शक्ल लिए
बड़ी बड़ी आँखों से देखती
न्याय की देवी
और चित्रित स्त्रियाँ  ...
अनवरत मौन चीखें
सिसकियाँ  ...
कितनी अजीब बात है
भगवान बना दी गईं
ग्रन्थ में समा गईं
पर !!!
कोई खुश नहीं !

नाम मत पूछना
उन्हें अच्छा नहीं लगेगा
किसी के वहम को नहीं तोड़ना चाहतीं
लेकिन,
सुकून के लिए
वे हर दिन
पक्ष-विपक्ष में
अपनी दलीलें प्रस्तुत करती हैं
न्याय की देवी की भरी आँखों में
एक न्यायिक फैसला देखती हैं
और
एक उम्मीद की कुर्सी पर बैठे हुए
अदालत में ही सो जाती हैं !

कुछ तो है प्रयोजन
मेरे होने का !!!

07 मई, 2017

कुछ ऐसा लिखूँ




मैं चाहती हूँ
कि मैं कुछ ऐसा लिखूँ
जिसमें से ध्वनि तरंगित हो
एक घर दिखाई दे
दिखे चूल्हे की आग
तवे पर रोटी
जो भूख मिटा दे
बुनकरों की विद्युत गति
जिसमें कृष्ण की हथेलियों का आभास हो
और हर जगह द्रौपदी की लाज रह जाए ...
लिखना चाहती हूँ कुछ ऐसा
जिसमें कर्ण जीवित हो उठे
उसके कवच कुंडल उद्घोष करें
उसके क्षत्रिय होने का !
परशुराम का क्रोध शांत हो जाए
और वे अपने शिष्य की निष्ठा को
एक नया आयाम दे जाएँ !
द्रोणाचार्य
एकलव्य का जयघोष करें
अर्जुन उसके आगे नतमस्तक हो
महाभारत महानयुग हो जाये
पितामह हस्तिनापुर का भाग्य लिखें
धृतराष्ट्र की आंखें बन जायें ..
लिखना चाहती हूँ
वह रामायण
जिसमें राम लक्ष्मण भरत शत्रुघ्न
सबकी पैजनियों की आवाज़ सुनाई दे
खीर का बँटवारा समान रूप से हो
मन्थरा का जन्म ही न हो
कैकेई का मातृत्व स्तंभ बने
उर्मिला अपनी उम्र को संगीतमय बना ले ..
लिखना चाहती हूँ
कलयुग का परिष्कृत रूप
जिसमें गुरुकुल की महिमा हो
अपशब्द न हों
हर घर में अमृत हो ...
मैं कलम में तब्दील होना चाहती हूँ
अपने भीतर श्री गणेश का आह्वान करती हूँ

03 मई, 2017

दृष्टिकोण - रहस्यमय भविष्य !





ताजमहल क्या है ?
अतीत की कब्र पर एक खूबसूरत महल !
जिसके सामने
आगरा के क़िले के शाहबुर्ज में
शाहजहाँ 8 वर्ष तक क़ैद रहा  ...
हर दिन
पर्यटकों से भरा रहता है
ताजमहल और आगरे का किला !
गाइड कहानियाँ सुनाते हैं
हम अचंभित
विस्फारित
आँखों से
आँखों देखा महसूस करते हुए
रोमांचित होते हैं
पर वर्षों की
आंतरिक
दहकती
ज्वालामुखी के लिए
कहते हैं
अतीत को भूल जाओ !!!
???
!!!
भूल जाओ !
अनसुना कर दो
चिंगारियों के चटकने की आवाज़ को
बेअसर हो जाओ
अंदर से आती चिरांध से
उन सारे मंजरों से
जो उस अतीत से उभरते हैं

क्योंकि इस इतिहास का अर्थ
हमारे लिए कोई मायने नहीं रखता
इसके जीवित गाइड की कहानियों से
हम ऊब जाते हैं
क्योंकि उसे महसूस करना
हमारे वश की बात ही नहीं
हमारी इच्छा भी नहीं !
...
ज्वालामुखी दृष्टि से परे है
किसी विशेष ऐंगल से
कोई यादगार तस्वीर भी
नहीं ली जा सकती
शुक्ल पक्ष हो
चाहे कृष्ण पक्ष
- क्या फर्क पड़ता है !!!

ताजमहल
कब्र होकर भी
प्रेम का प्रतीक है
फिर प्रेम हो ना हो
गले में बाँहें डालकर
एक तस्वीर के साथ
सब अमर प्रेम हो जाना चाहते हैं !

शाहजहाँ कहाँ कैद था
इस बात से अधिक महत्वपूर्ण है
वह किस तरह निहारता था वहाँ से
ताजमहल को !
इंसान की फितरत
अतीत वर्तमान से परे
एक अनोखा रहस्य्मय भविष्य है
जिस पर अनुसन्धान ज़रूरी है  !!!  ...

29 अप्रैल, 2017

सिसकियों में शब्द गूँथना




तुम्हारी सिसकियों में शब्द ही शब्द थे
जिन्हें मैं सुनती रही
सिसकियाँ मेरी भी उभरी
निःसंदेह
उसमें मेरे आशीष के बोल थे !
...
मानती हूँ मैं
कि क्षणांश को
गुस्सा आता है
पर कई बार
उसकी अवधि बढ़ जाती है
शायद तभी
एक कमज़ोर रूह की मुक्ति
संभव होती हो  !

लेकिन इस मुक्ति के बाद
आसपास कई शून्य चेहरों का
होता है शून्य स्नान
जाने कितने शब्द अटके होते हैं
अवरुद्ध गले में
जाने कितने शब्द चटकते हैं
सिसकियों में
शरीर भी असमर्थ
रूह भी असमर्थ
!!!

भागता शरीर
ठहरा मन
बड़ी अजीब सी स्थिति होती है
... !!!
सुनो,
जब भी चाहो
सिसकियों में शब्द गूँथना
बीता हुआ वक़्त
गले लग जाता है
अच्छा लगता है  ...

15 अप्रैल, 2017

कहा था न ?




कहा था मैंने
शिकारी आएगा
जाल बिछाएगा ...
भ्रमित होकर
फँसना नहीं !

लेकिन शिकारी ने
तुम्हारी आदतों को परखा
पारदर्शी जाल बिछाया
दाने की जगह
 खुद जाल के पास बैठ गया
संजीदगी से बोला,
आओ ...
कुछ बातें करें !

आंखों में आंसू भरकर
वह कहानियाँ गढ़ता गया ...
तुम अपनी सच्ची ज़िन्दगी के पन्ने
मोड़ मोड़ कर हटाते गए
उसकी कहानियों में उलझते गए
और एक दिन
शिकारी के जाल में थे तुम !

बिना फँसे अनुभव नहीं होता
यह सोचकर
मैं तुम्हारा सर सहलाती गई
जाल को टटोलकर
काटती गई
लेकिन उसके धागे
तुम्हारे दिलो दिमाग को
महीनता से खुरच गए थे  ...
शिकारी का भय
तुम्हारी नींद उड़ा गया था
और मैं  ...
लोरी के सारे शब्द भूल गई !

उम्र बीतने लगी इस सोच में
कि
शिकारी को ढूँढूँ
उसके लिए जाल तैयार करूँ
या किसी जादुई मरहम से
सारे भय मिटा दूँ
खरोंच के निशान मिटा दूँ !!

लेकिन
जो हो जाता है
वह तो रह ही जाता है।
चेहरा सहज हो
चर्चा में शिकारी न हो
आगे के रास्तों पर कदम हो
फिर भी
मन और दिमाग
शिकारी और अपनी भूल को
याद रखता है  ...

तुम्हारे अनमने चेहरे का दर्द
मेरे एकांत में बड़बड़ाता है
कहा था न ?


12 अप्रैल, 2017

पापा तुम समझते क्यूँ नहीं ?




पापा 
आज मुझे तुमसे बहुत कुछ कहना है !

कहना है,
कि जब मैं हुआ 
और तुम मुझे अपनी गोद में लेकर 
इधर उधर घूमते थे 
तो दुनिया अपनी मुट्ठी में लगती थी !
सबकी उपस्थिति में 
मुझ अबोले को 
रहता था इंतज़ार 
तुम्हारे आने का। 
कॉल बेल बजते 
मेरे दिल में भी कुछ बजता था 
तुम्हारी पुकार पर 
मेरी मटकती आँखें बोलतीं 
पापाआआ  ... 
सोचो पापा 
मैं कितना समझदार था !
... 
घुटनों के बल चलकर 
जब मैं तुम्हारी ओर तेजी से आने लगा 
तुम विजयी मुस्कान से सबको देखते 
मैं तुम्हारी उस मुस्कान पर 
फ़िदा था 
तुम्हारी हर जीत 
मेरी जीत होती 
सोचो पापा 
मैं कितना समझदार था !
... 
धीरे धीरे मैं चलने लगा 
सीखने लगा 
कुछ शब्द 
कुछ अच्छी आदतें 
लेकिन 
तुम्हारी जीत की परिभाषा बदलने लगी 
तुम चाहने लगे 
मैं सबसे ज्यादा शब्द बोलूँ 
सबसे पहले बोलूँ 
किसी भी अजनबी के आते 
उसे प्रणाम करूँ 
सलीके से बैठूँ 
ताकि तुम्हारी तारीफ़ हो  ... !

मैं धीरे धीरे बड़ा होना चाहता था 
और तुम  ... 
जाने कैसा बड़ा मुझे बनाना चाहते गए 
कितना कुछ सिखाते गए 
और पापा 
तब मैं ऊब गया 
मेरी जिह्वा से
स्वाद खत्म हो गया 
मेरी चुप्पी
मेरी ज़िद्दी दोस्त बन गई 
आक्रोश दिखाते हुए तुम भूल गए 
कि अपनी उम्र के अनुसार 
मैं वह नहीं सीख सकता 
जो मेरी कल्पना को 
दूसरी दिशा दे दे  ... 
पापा 
कल्पनाएँ अपनी होती हैं 
उसकी कहानियाँ होती हैं 
उन्हें किसी और पर थोपा नहीं जाता 
खासकर किसी बच्चे पर !!

अब मैं रात दिन यही सोचता हूँ 
कि तुम 
हाँ पापा तुम -
कितने ज़िद्दी हो 
तुम समझना ही नहीं चाहते 
कि 
इतना आसान नहीं होता सिखाना 
गुस्से से तो बिल्कुल नहीं  ... 

सिखाने के लिए 
धैर्य का होना ज़रूरी होता है 
साथ साथ करना होता है 
बच्चे को उठाने के लिए 
झुकना होता है 
उसकी पसंद नापसंद को 
जानने और समझने के लिए 
उसे वक़्त देना होता है 
... 
अगर तुम मुझसे दुखी हो 
तो मैं भी तुमसे दुखी हूँ 
इस बात को 


पापा तुम समझते क्यूँ नहीं ? 

रामायण है इतनी

रूठते हुए  वचन माँगते हुए  कैकेई ने सोचा ही नहीं  कि सपनों की तदबीर का रुख बदल जायेगा  दशरथ की मृत्यु होगी  भरत महल छोड़  स...