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मेरे एहसास इस मंदिर मे अंकित हैं...जीवन के हर सत्य को मैंने इसमे स्थापित करने की कोशिश की है। जब भी आपके एहसास दम तोड़ने लगे तो मेरे इस मंदिर मे आपके एहसासों को जीवन मिले, यही मेरा अथक प्रयास है...मेरी कामयाबी आपकी आलोचना समालोचना मे ही निहित है...आपके हर सुझाव, मेरा मार्ग दर्शन करेंगे...इसलिए इस मंदिर मे आकर जो भी कहना आप उचित समझें, कहें...ताकि मेरे शब्दों को नए आयाम, नए अर्थ मिल सकें ...

10 जुलाई, 2016

चयन आपका






किसी का होना सकारात्मक लगता है 
किसी की उपस्थिति नकारात्मक एहसास देती है 
नकारात्मक गति से 
समय रहते बचने का प्रयास बुद्धिमानी है 
भले ही रक्त संबंध क्यूँ न हो 
.... इस स्थिति से निकलना 
भयानक असमंजसता की स्थिति है 
पूरी ज़िन्दगी उतार-चढ़ाव, 
जानलेवा खाई से गुजरती जाती है 
दिनचर्या पर प्रभाव 
बच्चों पर प्रभाव 
सबसे अधिक अपने व्यक्तित्व पर ग्रहण !!!
... 
इस चक्रव्यूह में 
अपना मन 
अपना दिमाग ही अधिक मारता है 
अपने करीबी मारते हैं 
और असली मृत्यु  ... बहुत दूर होती है !

ज़िन्दगी को जीने के लिए चयन आपका  
- सिर्फ आपका है 
खुली हवा के लिए खिड़की खोलें 
या फिर मन की कमज़ोरी का विषपान करें  ... 

20 जून, 2016

लापता परखचे




एक विस्फोट
... और शरीर के परखचे 
इधर से उधर बिखरे हुए 
सारे टुकड़े मिलते भी नहीं !!

लापता व्यक्ति 
न जीवित 
और  ... मृत तो बिल्कुल नहीं !!

खुली आँखों के आगे 
एक टुकड़े की तलाश 
और इंतज़ार 
आँखों की पोरों में सूख जाती है 
लुप्त गंगा सी !!

लेकिन उस विस्फोट में, 
जहाँ शरीर,
मन के परखचे दिखाई देते हैं 
उन्हें न जोड़ पाने की तकलीफ भी 
नहीं जोड़ी जा सकती !

दिनचर्या,
पेट की आग,
जीवन के कर्तव्य  
और टुकड़ों को सीने की कोशिश  ... !!!

अपने मन से तो कोई लापता भी नहीं होता 
खुद को देखते हुए 
अनजान होकर चलना 
त्रासदाई है !
होकर भी ना होने की विवशता 
ये होते हैं लापता परखचे 
जिनकी न कोई चीख होती है 
न कोई आहट 
न खुशी 
न दर्द 
सिर्फ एक सन्नाटा  ... 

साल,तारीखें  ... मन के अंदरूनी परखचों पर लिखे होते हैं 
विस्फोट की भयानक आवाज़ें 
रिवाइंड,प्ले होती रहती हैं 
एक एक टुकड़े 
कुछ न कुछ कहते रहते हैं 
सुनते हुए बहरा बना आदमी 
हँसता भी है 
व्यवहारिकता भी निभाता है 
लेकिन  ... परखचों से मुक्त नहीं होता !!!

14 जून, 2016

मैं स्त्री






मैं स्त्री
मुझे दी गई है व्यथा
पर मैं व्यथा नहीं हूँ
मुझमें आदिशक्ति का प्रवाह है
है अपने स्व' के लिए धरती में समाने की क्षमता
प्रश्नों के घेरे में राहुल को पालने का मनोबल  ...
मेरे आँसू
मेरी कमज़ोरी नहीं
मंथन है
जीवन-मृत्यु का
यदि मैं माँ; हूँ
तो मैं जीना चाहती हूँ
अपने सम्पूर्ण कर्तव्यों के लिए
यदि मैं परित्यक्ता हूँ
तो मैं जीना चाहती हूँ
अपने सत्य के लिए
यदि छीन ली गई है मेरी तथाकथित इज़्ज़त
तो मैं जीना चाहती हूँ
उदाहरण बनना चाहती हूँ
मौन शाप का परिणाम देखना चाहती हूँ
!!!
मेरे आँसू मेरी हार नहीं
मेरी जिजीविषा हैं
क्योंकि हर हिचकी के बाद
एक इंद्रधनुष मेरी वजूद में होता है
...
मैं स्त्री
कृष्ण बनने की कला जानती हूँ
अपने अंदर गणपति का आह्वान करके
अपनी परिक्रमा करती हूँ
मैं स्त्री,
धरती में समाहित अस्तित्व
जिसके बगैर कोई अस्तित्व नहीं
न प्राकृतिक
न सामाजिक
और मेरे आँसू
भागीरथी प्रयास  ... !!!

10 जून, 2016

.....लोग !!!





तमाम उम्र सोचती रही 
कहना है लोगों के बीच अपना सच  ... 
लोग !
लोग !
लोग !
उम्र अब लगभग एक पड़ाव पर है 
और लोग !!! 

लोग नहीं बदले  ... 
मेरी सोच बदल गई -
वे सच जानकर करेंगे क्या !
उन्हें तो सच पहले भी मालूम था 
बस उसे वे मानना नहीं चाहते थे 
गर्म खौलते तेल में पड़ जाए हाथ 
उनकी चाह रही 
जाने क्या संतुष्टि थी !
अब मैं सोचती हूँ 
सच तो जो था 
वो अपनी जगह भयावह था 
लेकिन लोग !!! 
उनसे अधिक नहीं  ... 

03 जून, 2016

शूर्पणखा





शूर्पणखा

रामायण की वह पात्र 
जिसने अपनी मंशा के आगे 
राम लक्ष्मण की विनम्र अस्वीकृति को 
स्वीकार नहीं किया 
और अंततः दंड की वह स्थिति उत्पन की 
जिसने सिद्ध किया 
कि 
अपनी गलतियों पर पर्दा डालकर 
सही" की धज्जियाँ उड़ाई जा सकती हैं !

सीता अपहरण 
जटायु वध 
लंका का सर्वनाश 
सीता की अग्निपरीक्षा 
सीता के चरित्र पर लांछन 
लव कुश का पिताहीन बचपन 
सीता का धरती में समाना  ... 
एक ज़िद का परिणाम रहा। 

युग बदले 
सोच बदली 
परिवर्तित सोच के साथ 
हर पात्र को 
प्रश्नों के मकड़जाल में फंसा दिया सबने 
और अंततः 
... 
शूर्पणखा एक स्त्री थी,
लक्ष्मण को ऐसा नहीं करना चाहिए था 
जैसे स्वर उभरे 
रावण श्रेष्ठ हुआ 
उसके जैसे भाई की माँग हुई 
बीच की सारी कथा का स्वरुप ही बदल गया !

सतयुग हो 
 द्वापर युग हो 
या हो फिर कलयुग 
स्वर अक्सर विपरीत उठते हैं 
प्रमुख सत्य पर चर्चा होती ही नहीं 
न्याय हमेशा शोर बनकर रह जाता है 
और  ... 
एक मंथन में 
सिर्फ अमृत नहीं निकलता 
विष घट भी बाहर आता है 
एक दंश भरे जीव 
जीवन के आगे मृत्यु 
अपना तांडव दिखाती है 
देवता स्तब्ध होते हैं 
मनुष्य की कितनी बिसात !!!

18 मई, 2016

उम्र के केंचुल से बाहर






जब कभी बारिश होती है
जब कभी रुपहले बादल नीचे उतरते हैं 
जब कभी चाँदनी धरती पर उतरती है 
उस उम्रदराज़ औरत के भीतर से 
एक छुईमुई लड़की निकलती है 
हथेलियों में भर लेती हैं बूँदें 
बादलों में छुप जाती है 
चाँदनी को घूँट घूँट पीती है 
मन की ख़ामोशी से परे 
वह बन जाती है शोख हवा  ... 
अल्हड़ सी 
नंगे पैरों खुली सड़क पर छम छम नाचती है 
ज़िन्दगी उसके बालों में 
बूंदों की घुंघरुओं सी खनकती है 
अपनी सफ़ेद लटों को 
चेहरे पर लहराते हुए 
वह खुद में शायर बन जाती है !

कभी सुनना उसके घर की बातें 
शायरी सुनते हुए उसकी माँ कहती है 
- "हाँ तो अभी तुम्हारी उम्र ही क्या हुई!"
बड़े कहते हैं -
"तुम सबसे छोटी हो" 
और वह उम्रदराज़ औरत 
अपने बच्चों की उम्र की हो जाती है 
उसकी थकी आँखों में 
एक नन्हीं सी बच्ची खिलखिलाती है 
और फिर घंटों अपने मन के आँगन में 
वह खेलती है कंचे 
इक्कट दुक्कट 
डेंगापानी
कबड्डी - आइसबाइस 
डाक डाक - किसकी डाक !

उम्रदराज़ सहेलियाँ भी 
उम्र के केंचुल से बाहर निकल आती हैं 
... 
नई, बिल्कुल नई हो जाती हैं 
ज़िन्दगी की तरह 
!!!!!!!!!

02 मई, 2016

कहो कृष्ण !!!




माना कृष्ण 
जो भी होता है वो अच्छे के लिए होता है 
पर जब होता है 
तब तो अच्छा कुछ भी नहीं दिखता 

एक नई स्थिति
नए रूप में 
उबड़खाबड़ ज़मीन पर 
नई हिम्मत से खड़ी होती है 
एक नहीं सौ बार गिरती है 
निःसन्देह,
उदाहरण तो बन जाती है 
पर कृष्ण 
उदाहरण से पूर्व जो वेदना होती है 
बाह्य और आंतरिक 
जो हाहाकार होता है 
वह असहनीय होता है 
... 
तुम ही कहो 
तुम्हारे साथ जो भी हुआ 
उसमें तुम्हारे लिए क्या अच्छा था ? 
गीता सुनाकर भी प्रश्नों के घेरे में हो !!!

यह प्रश्न अनुचित है कृष्ण 
"तुम्हारा क्या गया जो तुम रोते हो"
तुम भी समझो 
पूरा गोकुल तुम्हारा था 
कर्तव्य अपनी जगह है 
पर चले जाना हाथ से सबकुछ  ... 
मन को बीमार कर देता है 
भीड़ में अकेला कर देता है !
अकेला होकर आदमी कितनी भी बड़ी बात कह दे 
पर अकेलेपन का दर्द 
उन्हीं बातों को दुहराता है 
जो चला जाता है !!!
ऐसे में 
इस बात की भी कोई ज़रूरत नहीं थी 
कि तुम 
अपने नाम से पहले राधा का नाम दो 
पर इसे देकर तुमने यही विश्वास दिया 
कि तुम राधा के पास हो 
रोने की ज़रूरत नहीं  ... 
फिर भी राधा प्रतीक्षित रोती रही 
तुम राधा को गुनते रहे  ... 
जाने देते इस नाम को 
... 

लाने का उपक्रम तो हम ही होते हैं न कृष्ण 
ऐसा नहीं होता 
तो ऐतिहासिक कहानियाँ नहीं होतीं !
सहकर बढ़ना नियति है 
एक दिन मृत्यु को पाना नियति है 
पर भूल जाना 
मान लेना कि अपना कुछ भी नहीं था 
संभव नहीं है 
जीतेजी जो सबकुछ भूल जाता है 
वह बीमार होता है 
उसे ठीक करने के लिए कई उपाय होते हैं 
... 
नहीं कृष्ण 
जो आज मेरा था 
वह कल किसी और का भी" होगा 
- मान सकती हूँ 
पर वह मेरा नहीं था, यह कैसे मान लूँ ?
क्या तुम देवकी के नहीं थे ?
यशोदा के नहीं थे ?
राधा के नहीं थे ? .... 
यदि यही सत्य है तो लुप्त कर दो कहानियाँ 
क्योंकि,
सारी कहानियाँ भी तो यहीं बनी थीं 
यहीं रह गईं 
फिर कहना-सुनना ही क्या है !
कहो कृष्ण !!!