About Us


मेरे एहसास इस मंदिर मे अंकित हैं...जीवन के हर सत्य को मैंने इसमे स्थापित करने की कोशिश की है। जब भी आपके एहसास दम तोड़ने लगे तो मेरे इस मंदिर मे आपके एहसासों को जीवन मिले, यही मेरा अथक प्रयास है...मेरी कामयाबी आपकी आलोचना समालोचना मे ही निहित है...आपके हर सुझाव, मेरा मार्ग दर्शन करेंगे...इसलिए इस मंदिर मे आकर जो भी कहना आप उचित समझें, कहें...ताकि मेरे शब्दों को नए आयाम, नए अर्थ मिल सकें ...

18 जनवरी, 2017

Yes I wish...




गुड़िया घर में खेलते हुए, 
स्कूल से कॉलेज तक सपने सजाते हुए 
एक लड़की "माँ" बन जाती है 
इत्मीनान से अपना बचपन फिर आँखों में भरती है 
.... 
अपने सपनों में 
अपने जाये के सपने भरती है 
थकती है 
ढूँढती है कोई विश्वसनीय हथेली 
जिसे थमाकर वह खुद में चाभी भर सके 
नई बैटरी लगा सके 
.... 
आश्चर्य, 
नहीं मिलने पर वो हारती नहीं 
बच्चे के भागते क़दमों से ऊर्जा लेती है 
उसकी मुस्कान से तरोताजा हो जाती है 
और एक नया दिन जीती है  .... 

मेरी बेटी, खुशबू की दिनचर्या से उभरे ख्याल, 
हर माँ, 
हर पिता के लिए 



How I wish...there was someone reliable at Home who I can give you when I wanted to have 5 more minutes of sleep in the morning but couldn't as you were wide awake...
How I wish...there was someone reliable at Home who I can give you when I wanted to peacefully have a coffee but couldn't as you were crawling and standing to hold anything and everything...
...
How I wish there was someone reliable at home who I can give you when I wanted to cook a nice meal and have it in one go but couldn't as you started crying the moment I went to kitchen...
....
How I wish there was someone reliable at home who I can give you when I wanted to lie down to take some rest in the afternoon but couldn't as you were ready for your lunch..
....
How I wish there was someone reliable at home who i can give you when in the evening I wanted to watch something on TV just to refresh myself but couldn't as you were all cranky because you were feeling sleepy yet wanted to play...
How I wish there was someone reliable at home who i can give you when at night after having a tiring day I just wanted to sleep on more than half of the bed but couldn't as you were super playful....
...
Aah how I wish...
BUT
The moment I leave my 5 minutes of sleep and wake up, say it's a good day and a good morning to you, you give me the best morning smile...it's then I wish that only you and me , be in our beautiful world...

The moment I leave my coffee and come running after you saying Kunu ko pakdo, you start giggling...that giggle calms my senses like no coffee can do...it's then I wish that only you and me , be in our beautiful world...

The moment I open the kitchen door to pick you up and you come crawling fast and hold my legs...I get all the energy that no food can ever give...it's then I wish that only you and me , be in our beautiful world...

The moment I give up my afternoon nap to feed you...and with all the chidiya tota kabootar game when you finish your lunch... my heart gets all the rest which no afternoon sleep can give...it's then I wish that only you and me , be in our beautiful world...

The moment I switch off the TV and take you in my arms, play peek a boo closing your eyes and you give a toothless smile to me... then, after playing for a while you fall asleep in my arms, it's then I wish that only you and me , be in our beautiful world...
The moment at night to stop you from playing more, I tell you lights off, waking time over and you jump on my face give me a kiss, start making so many sounds out of which I understand 'Mamma' and 'nai ni nai ni nai ni', it's then I wish that only you and me , be in our beautiful world...

And when you end our day with your good night...and I watch you sleeping by my side it's then I realise that even if there is someone reliable at home I won't be able to enjoy any moment without you...Yes I wish...I wish you keep loving me, needing me like this forever... Yes I wish...I wish that only you and me , be in our beautiful world...

KHUSHBOO PRIYADARSHINI 

31 दिसंबर, 2016

साल खत्म ! हैप्पी न्यू ईयर















कैलेंडर के पन्ने कम हो गए 
बस एक आखिरी पृष्ठ 
और साल खत्म !
हर साल एक ही जुमला 
"कितनी जल्दी बीत गया  ... "

बीत तो बहुत कुछ गया 
कुछ चेहरे 
कुछ उम्र 
कुछ यादें 
कुछ कहकहे 
कुछ धूप की गुनगुनी खिलखिलाहटें !!! 
... 
न वक़्त है 
न हम हैं 
न ठहराव  ... 
तारीखें तो खुद बदल जाती हैं 
अगर हमें बदलना होता 
तो दिन महीने साल इंतज़ार ही करते रहते !

एक ही जगह पर 
हम इतनी तेजी से दौड़ रहे हैं 
कि बगलवाली कुर्सी को देखने की भी फुरसत नहीं 
कभी देख लो 
तो कुछ नया सा लगता है 
या अचानक लगता है 
धूल जमी है - हटा देना चाहिए !

हर नुक्कड़,चौराहे 
 बातों के शोर में 
अनजान, 
अजनबी से हो गए हैं 
घर में घुसकर भी 
बातों का सिलसिला नहीं रुकता 
रात 
देर से होती है 
सुबह 
बिना नाश्ता किये 
एक रात की तलाश में 
निकल जाती है 
... 
किसी एक दिन 
किसी विशेष दिन का अलार्म बजता है 
एक मेसेज  ... फॉरवार्डेड मेसेज उसकी भरपाई कर देता है 
बस ऐसे ही एक दिन 
कैलेंडर का आखिरी पृष्ठ 
अपने बीतने की सूचना देता है
हम मुँह को आश्चर्य की मुद्रा में लाते हैं 
फिर  ... 
नशे में चीखता है पुराने साल से कोई 
"हैप्पी न्यू ईयर " 
साल की पहली तारीख नशे में 
फिर सड़क पर ज़िन्दगी शीशा चढ़ाये दौड़ती है 
या किसी मेट्रो में 
.... 
कैलेंडर का पहला पन्ना 
बिना मिले पलट जाता है  ... 

23 दिसंबर, 2016

इससे ऊपर कोई परिचय क्या ?





मैं कौन हूँ ?
अपने पापा की बेटी
माँ की बेटी
बहन हूँ
माँ हूँ
और सबसे बड़ी बात
नानी और दादी हूँ
....
इससे अलग
कमल की सीख पापा ने दी
कलम को आशीष माँ से मिला
सूखे पत्ते में जीवन है
ढूँढने का साहस मिला
सबसे छोटी बहन होने से
बड़ों से बहुत कुछ सीखने को मिला
कुछ यूँ :)
"हर अगला कदम पिछले कदम से
खौफ खाता है
कि हर पिछला कदम अगले कदम से बढ़ गया है"
...
माँ होकर
मैंने जीवन को परतों में जाना
अतीत का मर्म भी समझ में आया
बदहवास धुंध में गुम आवाज़ें
मुखर होने लगीं
...
अपनी करवटों से अनभिज्ञ होते
मैंने बच्चों की करवटों से तादात्म्य जोड़ा
दूर होकर भी
उनकी पदचाप सुनती रही
दिल दिमाग की बेचैनी
समझती रही
खुशियों के झरने में भीगती रही  ...

अब तो मैं इनदिनों तोतली भाषा हूँ
अनोखे बोल हूँ
किलकारियों की प्रतिध्वनि हूँ
खिलौनों की पिटारी हूँ
कहानियों की किताबें हूँ
लोरी हूँ
...
इससे ऊपर कोई परिचय क्या ?

20 दिसंबर, 2016

बक बक बूम बूम ...





बक बक बूम बूम
रजाई धुनता हुआ 
धुनिया 
किसी संगीत निर्देशक से 
कम नहीं लगता था !
बर्फ के फाहे जैसी उड़ती 
छोटी छोटी रूइयाँ 
नाक,कान,आँख,सर पर 
पड़ी होती थीं 
जितनी हल्की होती रूइयाँ 
उतनी बेहतर रजाई !
उसके ऊपर 
मारकीन के कपडे का खोल 
रजाई की आयु बढ़ जाती थी 
एक अलग सी गंध आती थी
उस रजाई से  
पूरे परिवार की सुरक्षा होती थी 
उसकी गर्माहट में  
भारी रजाई के नीचे से 
निकलने का 
मन नहीं होता था !
बड़े शहरों में होता है धुनिया 
लेकिन,
वेलवेट की रजाई 
एक से एक दोहर का आकर्षण 
कमरे की रुपरेखा बदल गई 
... ... 
कुछ भी कहो 
वो गर्माहट नहीं मिलती 
ना वह धुन सुनाई देती है 
बक बक बूम बूम  ... 

02 दिसंबर, 2016

कुछ तो रह जाता है ...




पर उसके शरीर से लगे थे
उसके  ...
यानि उस स्त्री के
वह -
जो चाहती थी उड़ना
लेकिन उसे किसी ने बताया ही नहीं
कि उसे उड़ना है
वह उड़ सकती है !

उसे तो गुड़िया घर से उठाकर
दान कर दिया गया
शालीनता,
सहनशीलता का
पाठ पढ़ाया गया
जैसे बड़े बुज़ुर्ग कहते थे
कि लड़के रोते नहीं
वैसे गाँव घर की औरतें
दाँत पिसती हुई कहती थीं
- लड़कियाँ
खी खी खी खी
हँसती भली नहीं लगतीं
हँसने की आवाज़
किसी और को सुनाई दे जाए
तब तो बेशर्मी की हद !!!
ऐसी मानसिकता में
उसे पंख का ज्ञान भला कौन देता !

पता नहीं,
यह दुबके रहने की प्रथा कहाँ से आई
........ !!!

स्त्री को मन्त्र मिला
सती होने का
चिर वैधव्य निभाने का
वंश देने का
इज़्ज़त की धज्जियाँ उड़ानेवाले
जेठ देवर की सेवा करने का
सबको खिलाकर
बचाखुचा खाने का
खत्म हो गया हो खाना
तो भूखे पेट सोने का  ...

मन के विरुद्ध
सीखों का कूड़ा जमता गया
दुर्गन्ध से स्त्री उजबुजाने लगी
पागलों की तरह चीखने लगी
दहलीज़ लाँघकर
सड़क पर दौड़ गई
बिखरे बाल
फड़कते नथुने
एक ज्वालामुखी बन गई वह !
... किसी ने पागल कहा
किसी ने बदजात
किसी ने चुड़ैल-डायन
-
प्यार करनेवाली माँ ने कहा,
"लगता है देवी आ गईं !"

सुनते ही,
पूरा समाज डर गया
चरणों में झुक गया
और बेबस खड़ी
बहुत सारी स्त्रियों को
एक रास्ता मिल गया
भरपेट खाने का
सेवा पाने का
सुख से सोने का  ...

एक घर बाद के घर में
देवी का आना शुरू हो गया
असहय पीड़ा में
वह गुर्राने लगी
रक्ताभ चेहरे में
रक्तदंतिका ही घूरने लगी
और बेबस स्त्री चैन से सोने लगी  ...

इसी नींद ने उसे सोचने को बाध्य किया
बोलने को उकसाया
अपने सपनों के लिए
पंखों को खोलना बताया
...
फिर एक दिन
वह उड़कर मुंडेर पर बैठी
अवलोकन किया
आँगन का
जिसमें वह फिरकी सी खटती थी
फिर देखा दालान की ओर
जहाँ जाने की उसे इज़ाज़त नहीं थी
हाँ खेतों पर
अधेड़ उम्र में
वह रोटियाँ लेकर जा सकती थी
वह भी चुपचाप
!!!
वह नहीं कह सकती थी
कि घर के अंदर वह एक चूल्हा थी
जिसमें लकड़ियाँ फूँककर जलाई जाती थी
काम होने के बाद
पानी डालकर उसे बुझा दिया जाता था
जली लकड़ियों का कोयला भी
काम में आता  ...
बिल्कुल गाय पर लिखे निबंध की तरह
उसका जीवन था !
यह सब सुनाना वर्जित था
यूँ कोई सुनता भी क्यूँ !!!

स्त्री ने आँखें बन्द कीं
और पंखों ने आकाश को नापा
आलोचना,
फिर ताली
फिर होड़
एक शहर से दूसरे शहर
स्त्री अकेली हो गई !

पैरों पर खड़ी होकर भी
उसे प्रश्नों के जवाब देने थे
खाना बनाना सीखा ?
शादी अब तक नहीं हुई ?
रात में कब तक लौटती हो ?
फिर घर ???
जवाब दिया उसने
लेकिन
सुननेवालों को तसल्ली नहीं मिली
ज़िद ने उसे उसके भीतर बन्द कर दिया
पंख होते हुए भी
उड़ते हुए भी
वह एक अजीब से पिंजड़े में कैद हो गई
अकेलेपन की तीलियों में
लहूलुहान होने लगी
....
एक स्त्री
पहचान लेती है अपना वजूद
दिखा देती है अपना वजूद
खाइयों को पार कर जाती है
हर क्षेत्र में उड़ान भरती है
फिर भी,
कुछ तो रह जाता है
लेकिन क्या !!!!

11 नवंबर, 2016

प्रत्याशित अप्रत्याशित स्थिति




कभी लगता है सन्नाटा
कभी शोर !
कभी महसूस होता है
हो गई है मिट्टी
मेरे दिलोदिमाग की
 - सख्त और बंजर !
या फिर कोई निरन्तर
एक ही जगह की मिट्टी को
हल्का बनाये जा रहा है  ... !
इतना हल्का
कि खुद के होने पर संदेह हो !!

अजीब अजीब से दृश्य पनपते हैं
मैं आग का सैलाब बनकर बहती हूँ
कभी नदी में जमी बर्फ होती हूँ
अचानक
पतली रस्सी पर
डरती
डगमगाती
आगे बढ़ने का प्रयास करती हूँ
सोचती हूँ,
मैं तो नट नहीं
फिर कैसे संभव कर पाऊँगी !
तपते
लहकते अंगारों पर
सत्य के लिए चलती हूँ
आश्चर्य
और अहोभाग्य
कि फफोले नहीं पड़ते
...
भय भी  मेरा सत्य हुआ है
दुर्भाग्य भी
सहमी काया
चीखता स्वत्व
अडिग साहस
जंगल के अँधेरे में
भयानक आवाज़ों के मध्य से
मेरा "मैं" पार हुआ है
किनारा पाकर
पुनः भँवर में पड़ी हूँ
 कई बार यह भँवर
अकस्मात् आया है
कई बार मैंने खुद बना डाला है
जानते-समझते भी मूर्खता !

महसूस होता है
ये सारी घटनाएँ
मेरे निकट
मेरे ही लिबास में
रस्सी कूद रही है  ...
कई बार इतनी तेज
कि घण्टी बजने की आवाज़ सुनाई नहीं देती
ज़रूरी सा काम
अगले दिन की प्रतीक्षा में
लौट जाता है
कह देता है,
"घर में कोई था ही नहीं  ... "

मैं थी
मैं हूँ
अरे, कहाँ जाऊँगी
...
कोई सर सहलाता है
मैं टिका लेती हूँ
अपना सर
पीछे
सुनने लगती हूँ आवाज़ें
आवाज़ों के बीच सन्नाटे को
.... प्रत्याशित
अप्रत्याशित स्थिति में   ....

04 नवंबर, 2016

प्रतिनायक




नायक खलनायक के मध्य
होता है एक चरित्र
प्रतिनायक का
घड़ी के पेंडुलम की तरह  ... !!!
कभी वह नायक से भी बढ़कर हो जाता है
कभी इतना बुरा
कि उसकी उपस्थिति भी नागवार लगती है
परिस्थितियों में उलझा
वह करने लगता है उटपटांग हरकतें
कुछ ना सही
तो जोकर बनकर हँसाने लगता है
जीत लेने के लिए सबका विश्वास
बन जाने को सबका नायक  ...

दरअसल वह तुरुप का पत्ता होता है
जब जहाँ जैसी ज़रूरत
वैसा इस्तेमाल !
बिना उसके ज़िन्दगी चलती नहीं
चल ही नहीं सकती
समय,
हुजूम
हमेशा एक सा नहीं होता
और प्रतिनायक हर डाँवाडोल स्थिति में
खरा होता है
नहले पे दहला है उसकी उपस्थिति  ...

लेकिन प्रतिनायक
इसे समझ नहीं पाता
वह कभी खुद को ज़रूरी
तो कभी गैरज़रूरी पाकर
अन्यमनस्क सा हो जाता है !
वह स्वीकार ही नहीं कर पाता
कि वह सामयिक ज़रूरत है
और ज़रूरी होना बहुत मायने रखता है
बिल्कुल रोटी,कपड़ा और मकान की तरह !
कई बार
वह नहीं समझना चाहता
कि अति सर्वत्र वर्जयेत
जैसे,
भूख न हो तो रोटी भी नहीं भाती
लेकिन इससे उसकी ज़रूरत नहीं मिटती
वैसे ही
उसका असामयिक अभिनय
किसी को नहीं भाता
लोग भी दुखी
प्रतिनायक भी दुखी !!!
...
कुछ अच्छा
कुछ बुरा
कुछ हास
इस तालमेल के साथ ज़िन्दगी चले
तभी ठीक है
अन्यथा,
नायक कब खलनायक हो
खलनायक कब नायक बन जाए
कहना
समझना
और उसे सहजता से ले पाना कठिन है

सौ बातों की एक बात -
थोड़ी मिलावट ज़रूरी है दोस्त :)