About Us


मेरे एहसास इस मंदिर मे अंकित हैं...जीवन के हर सत्य को मैंने इसमे स्थापित करने की कोशिश की है। जब भी आपके एहसास दम तोड़ने लगे तो मेरे इस मंदिर मे आपके एहसासों को जीवन मिले, यही मेरा अथक प्रयास है...मेरी कामयाबी आपकी आलोचना समालोचना मे ही निहित है...आपके हर सुझाव, मेरा मार्ग दर्शन करेंगे...इसलिए इस मंदिर मे आकर जो भी कहना आप उचित समझें, कहें...ताकि मेरे शब्दों को नए आयाम, नए अर्थ मिल सकें ...

11 अप्रैल, 2014

किसे ?






एक लम्बी सी चिट्ठी लिखना चाहती हूँ 
बहुत कुछ लिखना चाहती हूँ 
पर कोई ऐसा नाम जेहन में नहीं 
जिससे धाराप्रवाह सबकुछ कह सकूँ  … 
 चीख लिखूँ 
 डर लिखूँ 
सहमे हुए सन्नाटे लिखूँ 
सूखे आँसुओं की नमी लिखूँ 
बेवजह की खिलखिलाहट लिखूँ 
लिखूँ आँखों में उतरे सपने  … 
सोच रही हूँ नाम 
कौन होगा वह 
जो बिना किसी प्रश्न,तर्क कुतर्क के 
पढ़ेगा मेरी चिट्ठी 
और समझेगा !
कुछ दूर चलकर ही 
सुनने-समझने की दिशा बदल जाती है 
क्योंकि हर आदमी 
अपना प्रभावशाली वक्तव्य सुनाना चाहता है !
चिट्ठी छोटी सही 
छोटा सा मेसेज ही सही 
पढ़ने की फुर्सत नहीं 
पढ़ने लगे,सुनने लगे 
तो सलाह-मशविरे बीच से ही शुरू 
- पूरा कोई नहीं पढता 
सुनना तो बहुत दूर की बात है -
ज़िन्दगी स्केट्स पर है 
यह काम,वह काम 
यह ज़रूरत,वह ज़रूरत 
भावनाओं को समझने की बात दूर 
कोई सुनता भी नहीं 
भावनाएँ - बकवास हैं !
फिर प्रश्न तो है न कि 
अपनी बकवास किसे सुनाऊँ ?!

01 अप्रैल, 2014

नफ़रत से विरक्ति




नफ़रत ....!!!
हुई थी एकबारगी मुझे भी
शायद उम्र का तकाजा था !
पर जैसे जैसे उम्र
या शायद अनुभवों की उम्र बढ़ी
मैंने खुद को टटोला
नफ़रत का कोई अंश नहीं मिला
व्यक्ति,स्थान,परिस्थिति..
जिनसे मुझे नफरत हुई थी
उनका नामोनिशां तक नहीं मिला
तब जाना -
उन सब से मुझे विरक्ति हो गई
!
न स्थान बदलता है
न परिस्थिति
न व्यक्ति ....
तो उदासीन,विरक्त होना ही जीने की कला है
प्रतिक्रिया से परे
न उसकी उपस्थिति असर डाले
न अनुपस्थिति
.....
नफ़रत एक आग है
जो बुझती नहीं
और जब तक वह जलती है
न हम खुद को जी पाते हैं
न दूसरों के जीने को सहज ढंग से ले पाते हैं
तो इस आग से विरक्त होना श्रेयष्कर है
विरक्त मन निर्विकार हो जाता है
और निष्क्रियता सक्रियता में बदल जाती है ...
....
आसान नहीं होता
पर समय के हथौड़े
अंततः बेअसर होने को बाध्य कर देते हैं
या ..... हम याददाश्त को बदल लेते हैं !
कारण जो भी हो ...
नफरत बीमारी है
और प्राकृतिक सोच की दवा विरक्ति
जहाँ सच सच होता है
झूठ .......... एक मुस्कान दे जाता है
और कभी कभी खिलखिलाहट -
सुकून होता है - कि मोह और वैराग्य दोनों का पलड़ा बराबर है !!!

16 मार्च, 2014

तुम्हारे नाम हस्ताक्षर



कुछ खुमारी में डूबे शब्द हैं 
कुछ अंगड़ाई लेते पल 
कुछ दिन हैं, कुछ शाम 
कुछ सुबह, कुछ जागी रात 
एक ही दिशा में अटके कुछ ख्याल 
कुछ धरती, कुछ आकाश 
चुटकी भर क्षितिज का मिलन 
पंछियों की उड़ान 
कबूतर की गुटरगूं 
…………… सपनों का मिश्रीवाला घर 
जलतरंग की मीठी धुन 
लहरों का आवेग 
नदी की कलकल ध्वनि 
संध्या की धीमी रागिनी 
पलकों का टिपिर टिपिर मटकना 
गौरैये का फुदकना 
मुर्गे की बाँग 
आम बौर की मादक सुगंध 
थोड़ी फागुनी भांग 
…… 
मेरा बचपन 
मुझमें जीनेवाली सपनोवाली लड़की 
बारिश में नंगे पाँव छप छप दौड़ती लड़की 
खुले बाल हवा में इठलाती लड़की 
तुम्हारे नाम अपने हस्ताक्षर करती है 
अपने सुकून के लिए !
संभव है -
 तुम्हें ज़रूरत न हो 
फिर भी ख्यालों की प्यास बुझाने के लिए 
और कालांतर में समझने के लिए 
… हस्ताक्षर का क्या हुआ !!!
 है एक हस्ताक्षर - तुम्हारे नाम 

12 मार्च, 2014

अंतर्द्वंद !



'अपशब्द' दिलोदिमाग में नहीं उभरते
ऐसी बात नहीं
पर कंठ से नहीं निकलते
व्यक्तित्व के गले में अवरुद्ध हो जाते हैं !
'जैसे को तैसा' ना हो
तो मन की कायरता दुत्कारती है
पर वक़्त जब आता है
तब  .... एक ही प्रश्न कौंधता है
'इससे क्या मिल जाएगा !'
सही-गलत के बीच
मन पिसता जाता है
अपने ही सवाल हथौड़े सी चोट करते हैं -
'क्या यह गलत को
अन्याय को बढ़ावा देना नहीं ?'
मन का एक कोना हकलाते हुए कहता है
'क्या फर्क रह जाएगा फिर उसमें और मुझमें !'
यह आदर्श है ?
संस्कार है ?
या है पलायन ?
रही बात रिश्तों को निभाने की
तो एकतरफा रिश्ते होते कहाँ हैं !
इसी उधेड़बुन में उड़ जाती हैं रातों की नींदें
'हैल्युसिनेशन' होता है
हर जगह 'मैं' कटघरे में खड़ा दिखता है !
मन न्यायाधीश
मन गवाह
आरोप-प्रत्यारोप - आजीवन !
सच भी बोला है,
झूठ भी  …
सच कहूँ तो पलड़ा बराबर है
तो,
मैं भी तो पूर्णतया सही नहीं
बस अपशब्द कहने की गुस्ताखी कभी नहीं की !
क्या सच में कभी नहीं ???

08 मार्च, 2014

अपनी दृष्टि घुमाओ - अपनी स्वर्णिम गाथा लिखो



आज महिला दिवस है,
दिवस की सार्थकता के लिए
सुनो ऐ लड़की
तुम्हें जीना होगा
और जीने के लिए
नहीं करना कभी हादसों का जिक्र
क्योंकि उसके बाद जो हादसे होते हैं
पारिवारिक,सामाजिक और राष्ट्रीय
उसमें तुम्हारे हादसे
सिर्फ तुम्हें प्रश्नों के कटघरे में डालते हैं !

तुम आज भी
जाने कैसे सोचती हो
कि तुम्हारी चीखों से भीड़ स्तब्ध हो जाएगी
निकल आएगा कोई भाई उस भीड़ से
और तुम्हारी नक्कारा इज्जत के लिए
लड़ जाएगा आततायिओं से
याद रखो,
सच्चाई फिल्मों सी नहीं होती
और अगर कभी हुई
तो उसके परिवार के लोग तुम्हें कोसेंगे
फिर दूर दूर तक कोई गवाह नहीं होगा
और नहीं होगी कोई राहत की नींद तुम्हारी आँखों में  …

इन लड़ाइयों से बाहर निकलो
और जानो
इज्जत इतनी छोटी चीज नहीं
कि किसी हादसे से चली जाए !
इज्जत तो उनकी नहीं है
जो तुम्हें भूखे भेड़िये की तरह खा जाने को आतुर होते हैं
खा जाते हैं
उस हादसे के बाद
वे सिर्फ एक निकृष्ट,
हिंसक
 हैवान रह जाते हैं !

इस सत्य को जानो
अपने संस्कारों की अहमियत समझो
भीख मत माँगो न्याय की
अपना न्याय स्वयं करो
- अपने रास्तों को पुख्ता करो
अगली चाल में दृढ़ता लाओ
मन में संतुलन बनाओ
फिर देखो किसी की ऊँगली नहीं उठेगी
नहीं खुलेगी जुबान !

तुम अपनी दृष्टि घुमाओ
यह जो दिवस तुम्हें मिला है
उसे वार्षिक बनाओ
एक युग बनाओ  ....

यूँ सच भी यही है कि नारी एक युग है
जिसने घर की बुनियाद रखी
आँगन बनाया
बच्चों की पहली पाठशाला बनी
पुरुष की सफलता का सोपान बनी

दुहराने मत दो यह कथन
कि - अबला जीवन हाय  ....
आँसू उनकी आँखों में लाओ
जो तुम्हारी हँसी छीनने को बढ़ते हैं
स्वत्व तुम्हारा,अस्तित्व तुम्हारा
कोई कीड़ा तुम्हारी पहचान मिटा दे
यह संभव नहीं
उठो,
मुस्कुराओ
मंज़िल तुम्हें बुलाती है
निर्भीक बढ़ो
इतिहास के पन्नों पर
अपनी स्वर्णिम गाथा लिखो

28 फ़रवरी, 2014

मृत्यु के बाद



जन्म के बाद मृत्यु
तो निःसंदेह मृत्यु के बाद जन्म
कब कहाँ जन्म
और कहाँ मृत्यु
सबकुछ अनिश्चित   … !
कल्पना का अनंत छोर
जीने का प्रबल संबल देता है
साथ ही
मृत्यु की भी चाह देता है
चाह निश्चित हो सकती है
हो भी जाती है
पर परिणाम सर्वथा अनिश्चित
!!!
प्रयास के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं !!!
……………………
चलो एक प्रयास हम कल्पना से परे करें
मृत्यु के बाद का सत्य जानें
यज्ञ करें
विज्ञान की ऊँगली थाम आविष्कार करें
मृत शरीर की गई साँसों की दिशा लक्ष्य करें
सूक्ष्म ध्वनिभेद पर केन्द्रित कर सर्वांग को
…आत्मा में ध्यान की अग्नि जला
असत्य की आहुति दे
उस सूक्ष्मता को उजागर करें
…।
पाप-पुण्य की रेखा से परे
ईश्वरीय रहस्य को जाग्रत करना होगा
एक युग
एक महाकाव्य
एक महाग्रंथ का निर्माण करना होगा
जन्म-मृत्यु
इन दोनों किनारों को आमने-सामने करना होगा
संगम में मुक्ति है
तो उसी संगम में ढूंढना होगा
प्रेम का तर्पण
त्याग का तर्पण
मोह का तर्पण
प्रतिस्पर्धा का तर्पण
कुछ यूँ करना होगा
मृत्यु के पार सशरीर जाकर
आत्मा से रूबरू होना होगा -

22 फ़रवरी, 2014

कहानी कुछ और होगी सत्य कुछ और



मैं भीष्म
वाणों की शय्या पर
अपने इच्छित मृत्यु वरदान के साथ
कुरुक्षेत्र का परिणाम देख रहा हूँ
या  ....... !
अपनी प्रतिज्ञा से बने कुरुक्षेत्र की
विवेचना कर रहा हूँ ?!?

एक तरफ पिता शांतनु के दैहिक प्रेम की आकुलता
और दूसरी तरफ मैं
.... क्या सत्यवती के पिता के आगे मेरी प्रतिज्ञा
मात्र मेरा कर्तव्य था ?
या - पिता की चाह के आगे
एक आवेशित विरोध !

अन्यथा,
ऐसा नहीं था
कि मेरे मन के सपने
निर्मूल हो गए थे
या मेरे भीतर का प्रेम
पाषाण हो गया था !
किंचित आवेश ही कह सकता हूँ
क्योंकि ऐसी प्रतिज्ञा शांत तट से नहीं ली जाती !!
वो तो मेरी माँ का पावन स्पर्श था
जो मैं निष्ठापूर्वक निभा सका ब्रह्मचर्य
.... और इच्छितमृत्यु
मेरे पिता का दिया वरदान
जो आज मेरे सत्य की विवेचना कर रहा है !

कुरुक्षेत्र की धरती पर
वाणों की शय्या मेरी प्रतिज्ञा का प्राप्य था
तिल तिलकर मरना मेरी नियति
क्योंकि सिर्फ एक क्षण में मैंने
हस्तिनापुर का सम्पूर्ण भाग्य बदल दिया
तथाकथित कुरु वंश
तथाकथित पांडव सेना
सबकुछ मेरे द्वारा निर्मित प्रारब्ध था !

जब प्रारब्ध ही प्रतिकूल हो
तो अनुकूलता की शांति कहाँ सम्भव है !

कर्ण का सत्य
ब्रह्मुहूर्त सा उसका तेज  …
कुछ भी तो मुझसे छुपा नहीं था
आखिर क्यूँ मैंने उसे अंक में नहीं लिया !
दुर्योधन की ढीढता
मैं अवगत था
उसे कठोरता से समझा सकता था
पर मैं हस्तिनापुर को देखते हुए भी
कहीं न कहीं धृतराष्ट्र सा हो गया था !
कुंती को मैं समझा सकता था
उसको अपनी प्रतिज्ञा सा सम्बल दे
कर्ण की जगह बना सकता था
पर !!!
वो तो भला हो दुर्योधन का
जो अपने हठ की जीत में
उसने कर्ण को अंग देश का राजा बनाया
जो बड़े नहीं कर सके
अपनी अपनी प्रतिष्ठा में रहे
उसे उसने एक क्षण में कर दिखाया !

द्रौपदी की रक्षा
मेरा कर्तव्य था
भीष्म प्रतिज्ञा के बाद
अम्बा, अम्बिका, अम्बालिका को मैं बलात् ला सकता था
तो क्या भरी सभा में
अपने रिश्ते की गरिमा में चीख नहीं सकता था !
पर मैं खामोश रहा
और परोक्ष रूप से अपने पिता के कृत्य को
तमाशा बनाता गया !

अर्जुन मेरा प्रिय था
कम से कम उसकी खातिर
मैं द्रौपदी की लाज बचा सकता था
पर अपनी एक प्रतिज्ञा की आड़ में
मैं मूक द्रष्टा बन गया !
मुझसे बेहतर कौन समझ सकता है
कि इस कुरुक्षेत्र की नींव मैंने रखी
और अब -
इसकी समाप्ति की लीला देख रहा हूँ !

कुछ भी शेष नहीं रहना है
अपनी इच्छितमृत्यु के साथ
मैं सबके नाम मृत्यु लिख रहा हूँ
कुछ कुरुक्षेत्र की भूमि पर मर जाएँगे
तो कुछ आत्मग्लानि की अग्नि में राख हो जाएँगे
कहानी कुछ और होगी
सत्य कुछ और - अपनी अपनी परिधि में !