About Us


मेरे एहसास इस मंदिर मे अंकित हैं...जीवन के हर सत्य को मैंने इसमे स्थापित करने की कोशिश की है। जब भी आपके एहसास दम तोड़ने लगे तो मेरे इस मंदिर मे आपके एहसासों को जीवन मिले, यही मेरा अथक प्रयास है...मेरी कामयाबी आपकी आलोचना समालोचना मे ही निहित है...आपके हर सुझाव, मेरा मार्ग दर्शन करेंगे...इसलिए इस मंदिर मे आकर जो भी कहना आप उचित समझें, कहें...ताकि मेरे शब्दों को नए आयाम, नए अर्थ मिल सकें ...

22 मार्च, 2015

सरस्विता पुरस्कार २०१५




गौर से शब्द- शब्द पढ़ें, और अपनी रचनाओं को अपनी नज़र में सम्मानित करें - माँ सरस्वती के चरणों में पुष्प की तरह रखकर


Blue Buck Publications
सरस्विता पुरस्कार २०१५

सूचना

सरस्वती साहित्य, कला और संगीत की देवी हैं। बुद्धि, मन और चेतना के विभिन्न स्तरों पर वही वह शक्ति पुंज हैं, जिनसे अभिव्यक्ति के विभिन्न आयाम निःसृत होते हैं। स्व. सरस्वती प्रसाद का लेखन ऐसा ही एक जीवन्त प्रेरणा श्रोत है, जो आज भी हमारी रचनाधर्मिता को ऊर्जा दे रहा है। यह पुरस्कार उसी अमूल्य धरोहर से प्रेरणा पाने और उसे आगे बढ़ाने का उत्सव है, जो हर साल उनकी पुण्य-तिथि (१९ सितम्बर) को अपने विधा की सर्वोत्तम रचनाओं को दिया जाता है।

पिछले वर्ष के समयाभाव की समस्या को ध्यान में रखते हुए इस वर्ष हमने प्रविष्टि भेजने की अवधि तीन महीने रखी है।

तीन विधाओं में आपकी रचनाएँ आमन्त्रित हैं - कविता, कहानी और संस्मरण
रचनाएँ भेजने की अवधि : (२५ मार्च - 25 जून)
प्रविष्टि शुल्क : १००० रु. (प्रति रचना)
पुरस्कृत रचनाओं की घोषणा : अन्तिम सप्ताह, अगस्त २०१५
पुरस्कार वितरण : १९ सितम्बर २०१५, नई दिल्ली

पुरस्कारों का विवरण :

प्रशस्ति पत्र, पुरस्कार राशि, स्मृति चिन्ह एवं पुरस्कृत रचनाओं का पुस्तक के रूप में प्रकाशन। 
अन्य अपुरस्कृत किन्तु श्रेष्ठ रचनाओं का भी पुस्तक के रूप में प्रकाशन। (इस सम्बन्ध में आयोजक का निर्णय अन्तिम होगा।)

कृपया ध्यान दें :

1. एक विधा में एक ही रचना भेजें। आप सर्वाधिक तीन रचनाएँ भेज सकते हैं।
२. रचनाओं के साथ अपना सम्पूर्ण विवरण ज़रूर दें। (पूरा नाम, पता, फ़ोन नम्बर तथा NEFT का विवरण आदि)
३. रचनाएँ .doc फ़ाईल फ़ॉर्मेट में ही भेजें।
४. अपनी रचनाएँ saraswita2808@gmail.com पर मेल करें। किसी भी अन्य माध्यम से भेजी रचनाएँ स्वीकृत नहीं होंगीं।
५. प्रविष्टि शुल्क का भुगतान केवल NEFT से ही करें। कोई भी अन्य माध्यम स्वीकृत नहीं होगा।
६. प्राप्त शुल्क किसी भी परिस्थिति में ना तो रचनाओं के मध्य हस्तान्तरणीय है, और ना ही इसकी वापसी
सम्भव है। अतः उसी रचना के साथ भुगतान का विवरण संलग्न करें जिसे आप सर्वोत्तम समझते हों।
६. बैंक द्वारा प्रदत्त NEFT का विवरण अपने विवरण और रचनाओं के साथ ज़रूर संलग्न करें।
७. NEFT के लिए ज़रूरी विवरण :
Name – Blue Buck Publications
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नोट :

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श्रीमती रश्मि प्रभा
संस्थापिका एवं आयोजक
सरस्विता पुरस्कार

Blue Buck Publications के साथ।

01 जनवरी, 2015

2015 मंगलमय हो




पुराने वर्ष ने उतार दिया है अपना पुराना वस्त्र 
नई ताजगी, नए हौसलों के साथ 
2015 की आयु लिए 
खड़ा है नया वर्ष !
जन्मदिन की ढेरों बधाई वर्ष :)
बढ़ाओ अपने अनुभवी कदम 
- जिन्होंने खून की होली खेली 
तुम्हारे वस्त्रों को दागदार किया 
उन्हें दो गज ज़मीन भी न नसीब हो 
दिखा दो  … 
हर बच्चों को अपनी सी लम्बी आयु दो 
उनके भीतर हर मौसम की खासियत भर दो 
तुम बहुत सामर्थ्यवान हो वर्ष 
संकल्प लो 
खुशियों से झोली भर दोगे 
अन्याय को खत्म करोगे 
डाकिया बन एक चिठ्ठी 
सबके घर पहुँचाओगे 
हर रिश्तों के नाम  … 
ऐ वर्ष 
तुम तो बहुत बड़े हो 
दादा जी के दादा के दादा 
तुम इस भारत की तक़दीर बना दो 
ऐसी छड़ी घुमाओ 
कि दुश्मन दुश्मनी भूल जाये 
किसी का बेटा,भाई,पति  … शहीद न हो 
.... 
तुममें संभावनाओं का विस्तृत,विशाल समंदर है 
तुम चाह लो तो सब संभव है 
कहो न सबसे 
"मैं 2015 
सबके सपने पूरे करूँगा 
आतंक के साये से मुक्त करूँगा 
इतनी खुशियाँ दूँगा 
कि तुमसब निर्भय मेरे 
2016 वें वर्ष का स्वागत कर सको" 

30 दिसंबर, 2014

किंकर्तव्यविमूढ़ मैं






तबके अलग अलग होते हैं 
यूँ कहो 
बना दिए जाते हैं  … 
कामवाली बाई -
नाम जानकर क्या होगा ?
यह एक दृश्य है स्थितिजन्य  
एक सा - झोपड़पट्टी और ऊँचे घरों का 
कमला,विमला, … जो कह लो  … 
नीचे रो रही है 
घुटने फूटे हुए हैं 
पूछने पर कहती है 
पानी भरने में गिर गई 
आगे बढ़ती हूँ तो दूसरी बाई पूछती है 
क्या कहा उसने ?
… गिर जाने से घुटने फुट गए हैं "
हम्म्म 
गिरेगी ही !
पति छोड़ गया 
एक बेटा है 
ढंग से रहना चाहिए 
तो दोस्ती यारी में लगी है !
इसकी माँ कहती है, शादी कर लो,
तो कहती है - बेटे को वह नहीं देखेगा 
दीदी जी,
बेटे को देखने के लिए बहुत लोग हैं 
पर नहीं  … 
यूँ ही हीहीही करती रहेगी 
सलवार सूट पहनेगी 
.... 
किंकर्तव्यविमूढ़ मैं सुन रही हूँ 
सोच रही हूँ,
सहजता से कुछ भी कह देना 
इलज़ाम लगाना 
कितना आसान होता है 
ऐसे दुरूह रास्तों पर 
गुमराह न होकर भी लोग गुमराह हो जाते हैं !
सही-गलत की परिभाषा 
बड़ी विचित्र है 
एक ही कैनवस में 
एक सी ज़िन्दगी फिट नहीं होती !
बनाये हुए तबके का फर्क जो हो 
कोई सड़क पर गाली देता है 
कोई फाइव स्टार में अश्लीलता पर उत्तर आता है 
अलग अलग चेहरा है 
अलग अलग भाषा 
अलग अलग निष्कर्ष  … 
मुझे उस बाई से हमदर्दी है 
पर कह नहीं सकती 
क्यूँ ?
रहने दो,
मेरे कुछ कहने से क्या होगा 
अपने अपने मन से जवाब मिल ही जायेगा !!!

06 अक्तूबर, 2014

इश्क़




कहीं मुझे इश्क़ न हो जाए   .... !"
इश्क़ होने का डर क्यूँ?
और डरने से भी क्या?
इश्क़ सोचकर होता नहीं
कि उसे वक़्त दिया जाए
.... इश्क़ इंतज़ार भी नहीं करता दूसरे का
अपनी आग खुद जला लेता है
उसकी आँच में तपकर निखरता जाता है !

इश्क़ नहीं ढूँढता प्रतिउत्तर
वह अपनी ख़ामोशी को कहता है
अपनी ख़ामोशी को सुनता है
हीर कह लो
या राँझा
वह अपनी किस्मत आप ही लिखता है
आप ही जीता है
ये अलग बात है कि शोर उसे समेटने को बढ़े
 नुकीले पत्थर बरसाए
जो इश्क़ में डूब जाए
उसे कोई खौफ़ नहीं होता  …

दरअसल इश्क़ अपने सपनों से होता है
काल्पनिक छवि सजीव हो
ऐसा हर बार नहीं होता
पर सजीव हो तो खुद पे ऐतबार होता है !

कौन कहता है इश्क़ को कोई नाम दिया ही जाए
इश्क़ को इश्क़ भी ना कहो
तो भी ओस की बूँदें इश्क़ सी टपकती हैं
इश्क़ सी खूबसूरत हो जाती हैं
सिरहाने छुपकर
आँखों के समंदर की सीप में मोती बन जाने को
हर रात सपनों में उतरती हैं
ज़िद्द बढ़ जाए
तो खुली आँखों में भी सपनों सा खुमार बन जाती है !

इश्क़ न नाम है
न डर
न इंतज़ार
न प्रश्न  … इश्क़ की पूरी जमीन अपनी है
विश्वास के बीज लगाओ
लहलहाती फसलों में गुम हो जाओ  ……………………। 

16 सितंबर, 2014

ये आदतें




कल हम नहीं होंगे 
सोचकर,
…… …… 
अपने दिमाग में भी 
एक घुप्प सन्नाटा होता है 
…।  
ये जो चीज 
मैंने छुपाकर 
संभालकर रखी है 
वो फिर अपने मायने खो देगी 
सरप्राइज़ तो बिल्कुल नहीं रह जाएगा  
और यह जो डायरी सी लिखती हूँ 
नहीं रहने पर 
पता नहीं किस शब्द के क्या मायने हो जाएँ !
लॉकर की चाभी गुम हो गई है 
अचानक नहीं रही 
तो बहुत फेरा हो जायेगा !
अभी कई काम भी निबटाने हैं 
घर अस्त-व्यस्त है 
थकान,दर्द के बावजूद 
ठीक तो करना ही है 
ये दीवारों पर बारिश से चित्तियाँ हो गई हैं 
… ठीक है 
ये मेरा अपना घर नहीं 
लेकिन किराया दे रही हूँ,
कोई आएगा तो रखरखाव में 
मेरी सोच,
मेरे रहन-सहन की ही झलक मिलेगी 
… 
नवरात्रि नज़दीक है 
उससे पहले जितिया 
पूजा के लिए सफाई अभियान शुरू करना है 
… 
यूँ अचानक नहीं रहने पर 
सबकुछ धरा रह जाता है 
जैसे अम्मा का इयरफोन, चश्मा  ....… 

पर धरे रह जाने से पहले तो 
सबकुछ सिलसिलेवार होना ज़रूरी है न 
अम्मा की भी यही समस्या थी 
- एटीएम बदलवा दो 
- इस इयरफोन से ठीक सुनाई नहीं देता 
- सर दर्द - लगता है कुछ हो गया है 
- kbc आने का समय हो तो बताना 
-  एक कॉपी दो, लिख दूँ सवाल -जवाब इसके 
बच्चों के काम आएँगे   … 
… 
अब अम्मा नहीं है 
पर उसकी वे सारी आदतें, 
जिनपर हम झल्ला जाते थे 
टेक लगाकर भीतर बैठ गई हैं  … 
सुनो न अंकू
वो स्टिकर का काम 
वो प्रिंट 
वो  … … … 
देखो न मिक्कू ये काम बाकी है 
खुशबू, जरा वो काम देख लेना 
… पता है समय नहीं 
तुमलोगों को याद भी है 
फिर भी !
अब जवाब हो गया है 
- तुम एकदम अम्मा हो गई हो"
… मुस्कुराती हूँ,
अम्मा की बेटी हूँ न। 
फिर सोच की लहरें आती है 
और लगता है - कह ही लूँ,
भूल जाऊँगी 
.... आजकल भूलने भी लगी हूँ 
वो भी बहुत ज्यादा 
महीने का हिसाब करने के बाद भी 
लगता है,
शायद पैसे देने रह गए हैं 
किसी दिन दे देने के बाद दुबारे दे सकती हूँ !
उपाय निकाला है 
लिख लेती हूँ 
बशर्ते याद रहे कि लिख लिया है !
दीदी गुस्साती है 
'अरे तुम हम सबसे छोटी हो' 
ये तो सच है 
पर भूल जाती हूँ तो क्या करूँ !

अब क्या बताऊँ -
अम्मा बगल में सोने से पहले विक्स 
अमृतांजन,मूव सबकुछ लगाती थी 
नवरत्न तेल भी 
मैं अक्सर कुनमुनाती - 
अम्मा, इस गंध से मैं बीमार हो जाऊँगी 
.... अब रोज सोने से पहले मैं मूव,अमृतांजन लगाती हूँ 
दर्द ही इतना है कंधे में 
लगाते हुए सोचती हूँ 
- अंकू कुछ कहती नहीं 
परेशानी तो होती ही होगी  … 
दिन में कई बार हाथ बढ़ाती हूँ उसकी तरफ 
- उँगलियाँ खींच दो 
पढ़ाई रोककर वह ऊँगली खींचती है 
और मैं - अम्मा की तकलीफें सोचती हूँ 
और पूर्व की बातें 
… 
'क्या सोच रही हो अम्मा?' 
… 'ऐसे ही कुछ,कुछ'
- फ़ालतू सोचने से कुछ होगा ?
???????????
अब मैं सारे दिन कुछ कुछ सोचती हूँ 
अपनी समझ से सार्थक 
दूसरे की दृष्टि से फ़ालतू !!!
सोचते हुए चेहरा अजीब सा बन जाता है 
जगह कोई भी हो - घर,मॉल, खाने की कोई जगह 
.... बच्चे टोकते हैं,
माँ, तुम किसी को नहीं देख रही 
पर लोग तुम्हें देख रहे हैं 
हँसी आ जाती है 
लेकिन अगले क्षण वही हाल !

राशन लेते लेते अचानक 
मोबाइल पर पंक्तियाँ टाइप करने लगती हूँ 
घर जाते कहीं भूल न जाऊँ 
कई बार तो "माँ $$$$$$$$$$$$$$$$$$$$"सुनाई भी नहीं देता 
मुँए ये ख्याल 
जगह ही नहीं देखते 
फिल्म देखते हुए मैं सोचती हूँ 
- खत्म हो, घर लौटूँ तो कुछ लिखूँ !

सामने क्या 
हर कमरे में अम्मा की तस्वीर लगा रखी है 
जिधर जाउँ 
हँसकर कहती हैं 
'क्यूँ ? हो गया न मेरे जैसा?"
मैं मस्तिष्क में ही बड़बड़ाती हूँ 
- हम्म्म हो ही जाता है 
और हो जाने के बाद ही समझ आती है ये आदतें !!

12 सितंबर, 2014

चलो आज मैं तुम्हें माँ की कहानी सुनाती हूँ :)





सुनो
तुम मेरी ज़िन्दगी हो 
धड़कन हो हर चाह की 
माँ के लिए बच्चे से अधिक 
कुछ भी मूल्यवान नहीं होता  … 
हाँ,हाँ जानती हूँ इस बात को तब से 
जब मेरी हर बात में मेरी माँ होती थी 
.... 
चलो आज मैं तुम्हें माँ की कहानी सुनाती हूँ :)

ईश्वर एक दिन बड़ा परेशान था 
उसके पास बहुत सारे काम थे 
और वह सोच रहा था 
कि जब वह किसी कुरुक्षेत्र में 
न्याय-अन्याय की पैनी धार पे होगा 
तो सृष्टि में सूर्य कवच सा कौन होगा सुरक्षा में !
तभी उसकी माँ ने उसके सर पे हाथ रखा 
और कहा - 
जिस माँ के गर्भ से विराट स्वरुप का जन्म हो 
उस माँ की शक्ति से बढ़कर और कौन सी शक्ति होगी ?
माँ कंस से भी नहीं डरती 
9 महीने की सुरक्षा देकर 
जिस अर्थ को वह जन्म देती है 
उस अर्थ के आगे पूरी सृष्टि दुआओं के धागे बाँधती है  … 
ईश्वर मासूम बच्चे सा मुस्कुरा उठा 
और अपनी माँ के ह्रदय से एक माँ की रचना की 
धरती पर भेजकर निश्चिन्त हो गया। 

जानते हो,
माँ जादूगर होती है 
बच्चे की हर अबोली भाषा को समझती है 
उसकी नींद से सोती है, 
जागती है 
पूतना को मार गिराने की 
कंस को खत्म करने की 
धरती-आकाश के विस्तार को नापने की ताकत 
अपने जाये में भरती है 
सीने से लगाकर 
उसकी भूख मिटाकर 
उसमें विघ्नहर्ता सा साहस देती है  … 

तो अब तुम ही कहो 
तुमको रोने की क्या ज़रूरत 
तुम्हारे आगे लक्ष्मण रेखा सी माँ की दुआएँ हैं 
यूँ कहो उससे बढ़कर 
हाँ :) 
तुम भी उसे पार करके तूफ़ान में नहीं जा सकते 
हर आँधी तूफ़ान के लिए माँ का आँचल काफी है 
थपेड़े लोरी बन जाते हैं 
माँ के एक इशारे पर 
राक्षस तक बच्चे को हँसाता है 
तभी तो 
ऐसी हँसी पर ख़ुदा याद आता है 

03 सितंबर, 2014

सरस्विता पुरस्कार परिणाम एवं निमंत्रण




ब्रह्ममुहूर्त में सूर्य के आगमन की प्रतीक्षा में कई लोग खड़े हुए 
किसी ने पहले देखा 
किसी ने सूक्ष्म अंतर पर देखा 
देखा सबने 
सबकी आँखों में सूर्य था 
कुछ था तो बस सूक्ष्म का अंतर .... यही अंतर है सरस्विता पुरस्कार में
ब्रह्ममुहूर्त सी साहित्यिक प्रतियोगिता हर वर्ष होगी, जब जिसकी दृष्टि में पहले सूर्य कैद हों :):):)
सूरज तो सबका है

परिणाम इस प्रकार हैं - 

संस्मरण - श्रीमती लावण्या शाह (प्रथम)

कविता - श्री ज्योति खरे (प्रथम)

कहानी - डॉ स्वाति पांडे नलावडे (प्रथम)

 बहुत कम अंकों की दूरी पर क्रमशः काव्य विधा में सुश्री सुमन कपूर जी 
और कहानी विधा में श्रीमती संगीता पुरी जी रही हैं, 
तो सराहनीय शुभकामनाओं के साथ हम उन्हें प्रमाण पत्र भेंट करेंगे 

आप सबसे निवेदन है - 19 सितम्बर,2014 को संध्या 7. 00 बजे विमोचन और पुरस्कार समारोह में अवश्य आएँ 

RIVERSIDE SPORTS & RECREATION CLUB, 
MAYUR VIHAR - 1
DELHI - 91