30 नवंबर, 2013

ज़िन्दगी फिर से चले !






रात गए नींद नहीं आती
उम्र का असर है
या अनुभवों का तनाव
घड़ी की टिक टिक की तरह
हर दौर की सीढ़ियाँ चढ़ती-उतरती हूँ
साँसें चढ़ जाती हैं
तो बचपन के तने से टेक लगा
बैठ जाती हूँ
आँखें दूर कहीं लक्ष्य साधती हैं
कभी चेहरे पर मुस्कान तैरती है
कभी भय
कभी उदासी
कभी  … निर्विकार होना ही पड़ता है !
.... !
बचपन के तने से टिके शरीर के मन में
कई सवाल उठते हैं
एक के बाद एक  .... लहरों की तरह !
मन से बड़ा समंदर और कहाँ
और उसमें मोती मिल जाए
तो बात ही अलग है !
हाँ तो इस समंदर की कई लहरों के बीच
एक लहर करती है तुमसे सवाल
- तुम तो बिना हाथ पकड़े नहीं चल पाती थी
तो गई कैसे ?
कितनी सीढ़ियाँ उतरनी पड़ी होंगी
डर भी लगा होगा
.... दूर दूर तक  …
हम होकर भी नहीं थे
फिर भी -
तुम चली गई !

साँस रुक जाने से कहानी खत्म हो जाती है क्या  ?
साँसों को रोकने का खेल तो हम बचपन से खेलते आये हैं
फिर ये क्या बात हुई
और कैसे - कि अब तुम नहीं कहीं !
मुझे शक़ होता है
तुम हमें जाँच रही हो  ....
मुझे विश्वास है - तुम पास में रहती हो खड़ी
कभी झुककर अपने मोबाइल पर लिखती हो कुछ
सेंड' नहीं कर पाती
हाथ हिलता है न तुम्हारा
तो ऑफ बटन दब जाता है
और तुम उकताकर लेट जाती हो  …।

सवाल सवाल सवाल  …… एक आता है
एक जाता है
कभी कुछ सकारात्मक ले जाता है
कभी कुछ नकारात्मक से ख्याल ले जाता है !
मन के समंदर के इस किनारे मैं
- चाहती हूँ
बन जाऊँ गोताखोर
सम्भव है मेरे ही मन के एक सीप में तुम मिल जाओ
और -
ज़िन्दगी फिर से चले !

इस बार हम एक एक कदम
सोच-समझकर उठायेंगे
उन लोगों से कोसों दूर रहेंगे
जिनका मन हम सा नहीं था
थोड़ी व्यवहारिकता भी लाएँगे अपने व्यवहार में
सिर्फ मन से चलते रहने पर
बहुत ठोकर लगती है
और खामखाह बीमारी
इलाज़
और अंत में - सबकुछ मानसिक कहा जाये
इस बात का एक भी मौका हम नहीं देंगे

आओ अब सो जाएँ !

23 नवंबर, 2013

लड़ना प्यार है





लड़ने से रिश्ते नहीं खत्म हो जाते  ...
शिकायत  होती ही रहती है आपस में
उसे मन में रखना
सड़ांध पैदा करता है  …
अगर नहीं कह सके अपनी बात
रोकर-झगड़ कर
तो मन के अंदर विषबेल  फैलता है  ....
यूँ भी
विष के बीज मन कभी नहीं बोता
उसे दूसरा कोई बोता है
....
ऐसे में छानबीन तो होनी चाहिए न
किसने भेजा,किसने लगाया
नाम मिल जाए तो पूछो उससे
सम्भव है, सारी बातें झूठी हों
और हम-तुम दूर हो गए हों !!
....
भाई बहन
माँ बच्चे
दोस्त
पति-पत्नी
प्रेम
…… इनसे ही तो लड़ाईयाँ होती हैं
क्योंकि इनसे प्यार होता है
ख़्वाबों जैसे प्यार की उम्मीद होती है
……
(बकवास करते हैं लोग
कि प्यार में उम्मीद नहीं होनी चाहिए )
रूठना-मनाना, फिर खिलखिलाना
इसकी साँसें होती हैं
किसी तीसरे की ज़रूरत नहीं होती
तीसरा !!!
सारी बातें बिगाड़ देता है
………
पर बातों को लड़कर
सवालों से
ठीक कर सकते हैं हम
कर भी लेते हैं
यही नोक-झोंक तो अनुपस्थिति में गहराती है
!!!
ज़िंदगी सवालों का पन्ना है
जो सबसे तेज होता है
उसी से हम सवाल पर सवाल करते हैं
उसकी हार पर खुश होते हैं
अपनी जीत पर इतराते हैं
!!! पन्ना गुम होते
न जीत,न हार  .... किससे लड़ें !
तो मानो -
लड़ना स्वास्थ्य के लिए दवा है
जो जोड़ता है
तोड़ता नहीं
जो तोड़ दे वह लड़ाई नहीं
एक विध्वंसात्मक सोच है !!!
....
इसी फर्क को समझना है
जुड़ने और तहस-नहस करके मिटा देने का  !!!!!!!!!!!!!!!

……… लड़ने से रिश्ते खत्म नहीं होते
न कोई गाँठ पड़ती है
मीलों की दूरी में भी नज़दीकियाँ होती हैं
जब हम एक कॉल,
मेसेज
और चिठ्ठी के लिए लड़ते हैं  …
लड़ना प्यार है
सिर्फ प्यार !

08 नवंबर, 2013

अम्मा तुम गीता का एक महत्वपूर्ण पन्ना हो




पहलू ….
किसी का भी एक नहीं होता
कृष्ण के भी कई पहलू हैं
अलग अलग पहलुओं का जिम्मेदार
न भगवान् होता है न इंसान !
कृष्ण के पहलू यशोदा की दृष्टि से जो होंगे
वो नन्द बाबा की दृष्टि से अलग ही होंगे
गोपिकाओं की अपनी बात
राधा का अपना प्रेम
ऊधो का अपना ज्ञान
ताड़का,कंस,शकुनी की अपनी सोच !
दुर्योधन ने तो बाँध लेने की धृष्टता दिखाई
कृष्ण के पहलू को कमज़ोर समझा !!
जिस कृष्ण के आगे पूरी सभा स्तब्ध थी
वहां दुर्योधन ने उन्हें 'ग्वाला' कहकर सोचा
कि वह श्रेष्ठ है !!!
कृष्ण तो गीता हैं
और मेरी अम्मा तुम उस गीता का एक महत्वपूर्ण पन्ना हो
जिसने पढ़ा ही नहीं
वह व्याख्या क्या करेगा
और कितनी करेगा !!!
हम तो गोपिकाओं की तरह तुम्हारी शिकायत भी करते रहे
और रहे प्रतीक्षित
कि कब तुम हमारी मटकी का उद्धार करो
ऊधो का ज्ञान हमारे लिए निरर्थक था
हम तो गोपिकाओं की झिड़कियों पर निहाल थे
…………।

अब जब तुम गोकुल छोड़ गई हो
तो जाना - तुम्हारे बिना कैसे रहेंगे !!!!!!!!!!!!!!!

अक्षम्य अपराध

उसने मुझे गाली दी .... क्यों? उसने मुझे थप्पड़ मारा ... क्यों ? उसने मुझे खाने नहीं दिया ... क्यों ? उसने उसने उसने क्यों क्यों ...