About Us


मेरे एहसास इस मंदिर मे अंकित हैं...जीवन के हर सत्य को मैंने इसमे स्थापित करने की कोशिश की है। जब भी आपके एहसास दम तोड़ने लगे तो मेरे इस मंदिर मे आपके एहसासों को जीवन मिले, यही मेरा अथक प्रयास है...मेरी कामयाबी आपकी आलोचना समालोचना मे ही निहित है...आपके हर सुझाव, मेरा मार्ग दर्शन करेंगे...इसलिए इस मंदिर मे आकर जो भी कहना आप उचित समझें, कहें...ताकि मेरे शब्दों को नए आयाम, नए अर्थ मिल सकें ...

25 मार्च, 2017

दृष्टिगत प्रेम' प्रेम नहीं था




अपने नज़रिये से
जो "प्रेम" लगता है
वह "प्रेम"
हमेशा "प्रेम" नहीं होता
एकांत लम्हों का
सहयात्री होता है !
सहयात्री सुपात्र हो
ज़रूरी नहीं
कुपात्र भी हो सकता है
चक्रवात की हताशा
आगे बढ़ने की महत्वाकांक्षा
किसी के साथ
कोई भी रूप ले लेती है !!
उस वक़्त हर निर्णय
जायज लगता है  ...
यूँ
जायज हो
या नाजायज
तय करते रास्तों में
सूक्ति कौन सुनता है ?
*****
बिना सूक्ति के ही निर्वाण है
बिना सूक्ति के ही वनवास
बिना सूक्ति के विनाश
.... !!!
वक़्त की माँग जो निर्धारित करे
खत्म करे
अनुभवी बना दे  ...
सामयिक प्रेम अनुभव देता है
अनुभव स्पष्ट करता है
दृष्टिगत प्रेम' प्रेम नहीं था
डूबते तिनके का सहारा था
... 

11 टिप्‍पणियां:

  1. लम्हे गुजर जाने के बाद जो लगता है वही सच हो जाता है..

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" सोमवार 27 मार्च 2017 को लिंक की गई है.... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं
  3. आपकी ब्लॉग पोस्ट को आज की ब्लॉग बुलेटिन प्रस्तुति महादेवी वर्मा और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। एक बार आकर हमारा मान जरूर बढ़ाएँ। सादर ... अभिनन्दन।।

    उत्तर देंहटाएं
  4. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (28-03-2017) को

    "राम-रहमान के लिए तो छोड़ दो मंदिर-मस्जिद" (चर्चा अंक-2611)
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    उत्तर देंहटाएं
  5. बिना सूक्ति के ही निर्वाण है
    बिना सूक्ति के ही वनवास
    बिना सूक्ति के विनाश


    वाह ! बहुत खूब पंक्तियाँ आदरणीय

    उत्तर देंहटाएं
  6. प्रेम को परिभाषित करना कब किसी के लिए सम्भव हो पाया है..

    उत्तर देंहटाएं
  7. प्रेम की यह व्यावहारिक परिभाषा किंचित निराश करती है.ऐसा लगता है कि प्रेम में सब कुछ खोकर अपनी खिन्नता में कोई संत बनकर प्रवचन दे रहा है.

    उत्तर देंहटाएं
  8. सामयिक प्रेम अनुभव देता है
    अनुभव स्पष्ट करता है
    दृष्टिगत प्रेम' प्रेम नहीं था
    डूबते तिनके का सहारा था
    ..बहुत सही

    उत्तर देंहटाएं
  9. दृष्टिगत प्रेम' प्रेम नहीं था
    डूबते तिनके का सहारा था
    कहाँ जाता हैं डुबते को तिनके का सहारा ही बहुत होता हैं।
    सुन्दर शब्द रचना

    http://savanxxx.blogspot.in

    उत्तर देंहटाएं