21 जून, 2017

शीशम में शीशम सी यादें




छोड़ कैसे दूँ
उस छोटे से कमरे में जाना
जहाँ
पुरानी
शीशम की आलमारी रखी है
धूल भले ही जम जाए
जंग नहीं लगती उसमें  ... !
न उसमें
न उसमें संजोकर रखी गई यादों में
!
जब भी खोलती हूँ
एक सोंधी सी खुशबू
चिड़िया सी फड़फड़ाती
कभी मेरी आँखों को मिचमिचा देती है
कभी कंधे पर बैठ
कुछ सुरीला सा गाती है
कभी चीं चीं के शोर से
आजिज कर देती है  ...
!
लेकिन अगर जाना छोड़ दूँ
तो
अनायास मुस्कुराने का सबब
कहीं खो जायेगा
छुप जायेगा बचपन
किसी कोहरे में
अमरुद की डालियाँ
कच्चे टिकोले
लू में कित कित खेल की ठंडक
पानीवाला आइसक्रीम
कान का उमेठा जाना
और  ...
फिर से शैतानियों को दुहराना !

ये शीशम की लकड़ी से बना
यादों का ख़जाना
रुलाता है
हंसाता है
कहता है -
अगर घुटने छिले थे
तो शैतानियों का रंग भी लगाया था न सबको
अंतराक्षरी
स्टेज शो
माँ का आँचल
पापा की मुस्कुराहट
जाने क्या क्या रखा है मुझमें तुमने ही  ...

सच है
जाने कितने चेहरे
कितनी खिलखिलाहटें
कितने झगड़े
कितनी शिकायतें
शीशम की आलमारी में है
इस छोटे से कमरे का वजूद
इस ख़ज़ाने से ही है
न आऊँ किसी दिन
तो कुछ खोया खोया सा लगता है
खोना तो है ही एक दिन
उससे पहले पाने का सुख क्यों खो दूँ
छोड़ कैसे दूँ
उस छोटे से कमरे में जाना !!!

16 जून, 2017

सौ बार धन्य है वह लवकुश की माई




 मैं शबरी
फिर प्रतीक्षित हूँ
कि राम आयें  ...
...
नहीं नहीं
इस बार कोई जूठा बेर नहीं दूँगी
मीठा हो या फीका
यूँ ही दे दूंगी खाने को
नहीं प्रदर्शित करना कोई प्रेम भाव
मुझे तो बस कुछ प्रश्न उठाने हैं

- "हे राम
तुमने अहिल्या का उद्धार किया
कैकेई को माफ़ किया
उनके खिलाये खीर का मान रखा
 चित्रकुट में सबसे पहले उनके चरण छुए
जबकि उनकी माँग पर ही
राजा दशरथ की मृत्यु हुई थी
...
फिर सीता की अग्नि परीक्षा क्यूँ ?
किसकी शान्ति के लिए ?
सीता का त्याग
किसकी शान्ति के लिए ?
प्रजा के लिए ?
मर्यादा के लिए ?

हे राम,
उस प्रजा को
रानी कैकेई के चित्रकुट जाने पर
 कोई ऐतराज नहीं हुआ था ?

जिस सीता के आगे
रावण संयमित रहा
उस सीता के आगे
उनके अपने !!!
कलयुग का अँधा कानून कैसे बन गए ?
ऐसा था -
तो जिस तृण ने
माँ सीता का मान रखा था
क्या उस तृण की गवाही नहीं हो सकती थी ?
त्रिजटा थी उस अशोक वाटिका में
उससे ही पूछ लेना था सच !!

हे प्रभु
तुम्हें तुम्हारे रघु कुल की कसम
सच सच बताना
अगर अग्नि परीक्षा में माता जल जाती
तो क्या उनका सतीत्व झूठा हो जाता ?"

देखूँ - राम के न्यायिक शब्द
उनके मन के किस गह्वर से निकलते हैं
जिन्होंने कहा था,
सौ बार धन्य है वह एक लाल की माई
जिस जननी ने है जना भरत-सा भाई।"(मैथिलीशरण गुप्त )

मैं शबरी आज कहना चाहती हूँ
"सौ बार धन्य है वह लवकुश की माई
जिसने वन में उनको कुल की मर्यादा सिखलाई"



04 जून, 2017

एक उम्र की दिनचर्या और सोच




चलो कहीं बाहर चलते हैं
सुनते ही मन खाली हो जाता है
दूर दूर तक
कोई सीधी सड़क नज़र ही नहीं आती
न पेड़ों का समूह
न अपनेपन की हवा
बड़बड़ाने जैसा
होठों से फिसलते हैं शब्द
- कहाँ जाना !!!

जानती हूँ,
यह अच्छी बात नहीं
पर,
पहले जैसी कोई बात भी तो नहीं
न किसी से मिलने का मन
न बातों का सिलसिला
अकेला रूम अब आदत में शुमार है !

एक कुर्सी
कुछ भी खाने के लिए
शाम का इंतज़ार
बीच बीच में फ़ोन
छोटी
लम्बी बातचीत  ...
बाहर सबकुछ शांत
भीतर हाहाकार
!!!
प्रश्नों का सैलाब
यादों की लहरें
अनहोनी की सुनामी
कभी आँखें शुष्क रह जाती हैं
कभी होती हैं नम
कुछ बताते हुए किसी को
अचानक लगता है,
क्या व्यर्थ साझा किये जा रहे
... इसी तरह
रोज रात आ जाती है
घड़ी पर नज़र जाते
दिल धक से बैठ जाता है
कुछ दवाइयाँ गुटक कर
टुकुर टुकुर छत देखते हुए
करवट लेती हूँ
बीच में पुनः करवट बदलने के दरम्यान
यह ख्याल मन को सुकून देता है,
वाह, मुझे नींद आ गई थी !
कब?
हटाओ यह प्रश्न
 आ गई - यह बड़ी बात है
और एक नया दिन फिर सामने है  ...

शीशम में शीशम सी यादें

छोड़ कैसे दूँ उस छोटे से कमरे में जाना जहाँ पुरानी शीशम की आलमारी रखी है धूल भले ही जम जाए जंग नहीं लगती उसमें  ... ! न उसमे...