08 जुलाई, 2017

हम अपनेआप से भागते हैं




अक्सर
हम लोगों से नहीं
अपनेआप से भागते हैं
कहीं न कहीं डरते हैं
अपनी विनम्रता से
अपनी सहनशीलता से
अपनी दानवीरता से
अपनी ज़िद से
अपने आक्रोश से
अपने पलायन से  ...
बस हम मानते नहीं
तर्क कुतर्क की आड़ में
करते जाते हैं बहस
...
हम हारना नहीं चाहते
हम जीत भी नहीं पाते
क्योंकि हम
अपनी हर अति" के आगे
घुटने टेक
खुद को सही मान लेते हैं !!!

14 टिप्‍पणियां:

  1. कितनी सही बात कही है कि हम अपनेआप से डरते हैं फिर भी खुद को सही साबित करने के लिए तर्क कुतर्क करते हैं

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  2. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" रविवार 09 जुलाई 2017 को लिंक की गई है.................. http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  3. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (09-07-2017) को 'पाठक का रोजनामचा' (चर्चा अंक-2661) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  4. बिलकुल सही ...
    मंगलकामनाएं !!

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  5. भागना पड़ता है कई बार पर हमेशा नहीं भाग पाते हैं
    कभी कभी गलतफहमी हो जाती है और पकड़े जाते हैं ।

    बहुत सुन्दर।

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  6. अपनी विनम्रता से भागते हैं....
    कितनी गहराई से सोचती हैं आप...

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  7. अपने आप से बचना है बहुत मुश्किल -सामना करना और अधिक मुश्किल .

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  8. गहन यथार्थपरक चिंतन। सुन्दर प्रस्तुति।

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  9. गहन यथार्थपरक चिंतन। सुन्दर प्रस्तुति।

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  10. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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